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भारतीय राजनीति के अमर चरित्र और सियासत के मौसम विज्ञानी पासवान

रामविलास पासवान के पास 50 साल से भी अधिक का राजनीतिक अनुभव है। उनकी मंडली में सर्वजन हिताय के लोग शामिल रहते हैं।

Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 07 May, 2020 | 6:13 pm

रामविलास पासवान भारतीय राजनीति के उन चंद नेताओं में शुमार हैं जिनके पास पांच दशक से ज्यादा का संसदीय  राजनीति का अनुभव हैं। दलित राजनीति के सहारे अपनी पैठ बनाने वाले पासवान वैसे तो राजनीति बिहार से करते हैं लेकिन उनकी आवाज दूसरे राज्यों में भी सुनी जाती है। मोदी मंत्रिमंडल में शामिल पासवान की अपनी ठसक है और अलग राजनीतिक अंदाज भी। 

Main
Points
रामविलास पासवान के पास पांच दशक से भी ज्यादा का राजनीतिक अनुभव
राजनीतिक आकलन करने में कभी चूक नहीं करते
बिहार को अपने पासवान पर फख्र और नाज है

      देश का मौसम विभाग भले ही मौसम का आकलन करने में चूक कर दे, लेकिन बिहार के कद्दावर नेता और मौजूदा मोदी सरकार में खाद्य आपूर्ति और प्रसंस्करण मंत्री रामविलास पासवान कभी भी राजनीतिक आकलन करने में चूक नहीं करते हैं। यही वजह है कि देश की राजनीति में उनकी साख एक सफल राजनीतिक  ‘मौसम विज्ञानी’ के रूप में है और सच कहें तो यही उनकी  यूएसपी भी है। पासवान को बिहार पर नाज है या नहीं, ये तो पासवान जी ही बताएँगे  लेकिन बिहार को अपने पासवान पर फख्र है, नाज है और ऐतबार भी। 

      देश में दलित नेता के रूप में भले ही मायावती का चेहरा दिखता हो, लेकिन पासवान की दलित राजनीति और दलित समझ मायावती से कहीं आगे की है। दलित हित, समाजवादी सोच और ग्रामीण विकास के पैरोकार पासवान की राजनीति ठेठ गंवई है और उनकी मंडली में ‘सर्वजन हिताय’ के लोग शामिल रहते हैं। ब्राह्मणवाद के प्रबल विरोधी और कभी सवर्ण राजनीति पर कट्टर हमलावर रहे पासवान के वोट बैंक में अब सब शामिल हैं। अब वे कबीर की धारा में बहते दिखते हैं, जहां ‘न कोई दोस्त, न कोई दुश्मन’ की कहावत चरितार्थ होती है। पासवान परिवारवादी राजनीति के हिमायती है और वंशवादी राजनीति के पोषक भी। इस मामले में वे लालू के करीब हैं, तो देश के कई और वंशवादी राजनेता के समीप भी हैं। आरोप लगाने वाले चाहे जो भी कह लें, पासवान अपने मिजाज से डिगते नहीं। बिहार की राजनीति के वे ‘अमर चरित्र’ हैं जिस चरित्र पर बिहार इठलाता भी है और ‘रूदाली’ भी करता है।

     74  वर्षीय रामविलास पासवान का जन्म आजाद भारत से एक साल पहले 5 जुलाई, 1946 को खगड़िया में हुआ था। आजादी से पहले की क्रांति के वे भले गवाह नहीं हैं, लेकिन आजादी के बाद की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव, यानी ‘खेल’ के वे साक्षात दर्शक और चिंतक भी हैं। देश की बदलती राजनीति के पासवान ‘गवाह’ भी हैं और उस राजनीति के ‘पात्र’ भी। वे दलितों के मसीहा भी कहे जाते हैं, लेकिन बिहार छोड़ देश के बाकी दलित इन्हें अपना नेता नहीं मानते। पासवान करीब नौ बार चुनाव जीते और संसद पहुंचे, पांच प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया, मंत्रालय की कुर्सी पर बिराजे, लेकिन बिहार की काया को नहीं पलट पाए। यह आरोप पासवान पर सबसे बड़ा है।

             पासवान शतरंज के सफल खिलाड़ी हैं और देश की राजनीति की तुलना वे शतरंज से ही करते हैं। राजनीति अगर झूठ, मक्कारी, फरेब और जुमलेबाजी पर टिकी है, तो पासवान भी इसके पात्र हैं, क्योंकि चाहे वे जिस मंत्रालय को सम्हाले हों, उस मंत्रालय से जुड़े समाज का कायाकल्प कभी नहीं हो सका। उन पर कई आरोप भी लगे, लेकिन कोई भी आरोप साबित नहीं हो पाया।

कई पार्टियों की परिक्रमा 

                रामविलास पासवान का अपना तकिया कलाम भी हैं। ‘जे है से कि’ बोलकर वे अपना पूरा संवाद आगे बढ़ाते हैं और लोगों को लोटपोट भी करते हैं। ठेठ बिहारी मिजाज के पासवान की राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1969 से शुरू होती है बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में। फिर 1977 से 2014 तक वे कुछ अंतराल को छोड़कर संसद सदस्य के रूप में चुने जाते रहे। दलित सेना बनाई। दलितों की लड़ाई लड़ी। दलितों को कितना लाभ मिला, यह शायद ही कोई जाने, लेकिन आज भी वे दलितों के हिमायती हैं। 1974 में लोकदल, फिर जनता पार्टी और जनता दल की राजनीति करते-करते जब जी भर आया, तब लोजपा नाम की नई पार्टी को खड़ा किया। आज यह पार्टी मोदी सरकार के साथ है और पार्टी के छह संसद हैं। पासवान पत्रकार भी हैं। ‘न्याय चक्र’ के प्रधान संपादक हैं। इस पत्रिका में दलित आंदोलन, संघर्ष और दलित समाज से जुडी खबरें छपती हैं। और, पते की बात यह है कि पासवान वे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने कभी विश्व रिकॉर्ड बनाया, तो कभी शून्य पर आउट हुए।

     

            पासवान बार-बार दलों और राजनीतिक खेमों को बदलने के लिए जाने जाते हैं। छात्र आंदोलन के समय से नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ जुड़े रहने वाले रामविलास पासवान ने 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए फिर लालू के साथ गठबंधन किया और यूपीए से जुड़ गए, लेकिन पासवान को सफलता नहीं मिली। पासवान खुद हाजीपुर से लोकसभा चुनाव हार गए। 2014 के चुनाव में पासवान फिर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के साथ जुड़ गए और हाजीपुर से लोकसभा चुनाव जीते। 2019  में भी उनकी पार्टी की अच्छी जीत हुई और मोदी सरकार में  वे  फिर मंत्री बने। आज भी मंत्री हैं। समाजवादी विचार धरा और खासकर लोहिया और जय प्रकाश को मानने वाले पासवान जी अब पीएम मोदी की राजनीति के पैरोकार हैं। कल तक वे सोनिया गाँधी के गुणगान करते थे अब उनके आदर्श पीएम मोदी हैं। 

 

काम कम नाम ज्यादा 

           लंबे समय तक संसद सदस्य और केंद्रीय मंत्री रहने के बाद भी पासवान जी बिहार के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। उनकी इच्छा बिहार के मुख्यमंत्री बनने की रही, लेकिन अबतक यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार में सभी सांसदों को आदर्श गांव बनाने का फरमान मिला। पासवान भी वैशाली के भगवानपुर प्रखंड के अकबर मलाही को गोद लिया। खूब नारे लगाए थे ग्रामीणों ने। पासवान जी भी खूब बोले थे, लेकिन अकबर मलाही की हालत आज भी जस की तस है। गांव की हालत आज भी कुपोषित बच्चे जैसी ही है।  जर्जर सड़कें, कीचड़ और गंदगी, बंद पड़ा अस्पताल, शराबबंदी के बावजूद ताड़ी बेचने का खुला कारोबार, आजीविका के लिए तरसते लोग। आज आदर्श ग्राम अकबर मलाही की यही पहचान है। अकबर मलाही की तस्वीर नहीं बदली, लेकिन पासवान जी दूसरे गांव को भी गोद ले बैठे हैं।

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