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जातीय वर्चस्व पर टिका है बिहार का लोकतंत्र

बिहार का लोकतंत्र क्या है ? कहने के लिए चाहे जो भी हो ,सच यही है कि बिहार का चुनावी लोकतंत्र जाति पर टिका है। यही उसकी बुनियाद है। देश और दुनिया भर के समाज विज्ञानियों ,पत्रकारों ,शोध कर्ताओं ,चुनाव विश्लेषकों और राजनीति बाजों के लिए बिहार का चुनाव किसी शोधस्थली से कम नहीं। जाति के नाम पर बटा बिहारी समाज हर चुनाव में थोक के भाव में लोकतंत्र के नाम पर वोट तो डालता है।

Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 23 Aug, 2020 | 11:13 am

हालांकि अब पूरे देश में जातीय आधार पर ही चुनाव होते हैं और जातीय वर्चस्व के आधार पर ही किसी नेता की हैसियत राजनीति में आंकी जाती है। लेकिन बिहार का सच कुछ जुदा है। बिहार के नेता भाषणों में तो विकास और समाज की बात करते हैं लेकीन परदे के पीछे बैठकर जातीय गुना भाग लगाकर अपनी हैसियत तौलते हैं और सामने वालों को मात देने की कुटनीतिक चाल चलते हैं। बिहार का यही सच समाज विज्ञानियों के लिए अहम् हो जाता है। इस बार फिर बिहार चुनाव के कगार पर है। लोकतंत्र की दुदुम्भी बज रही है लेकिन जातीय वोट को लेकर दलों की अदला बदली भी जारी है। यह अदलाबदली राजद खेमे में भी है और जदयू खेमें में भी। लेकिन आप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस जातीय राजनीति पर बात करें तो वे पलट जाएंगे और कहेंगे कि वे जातीय राजनीति में यकीन नहीं करते ,विकास की राजनीती करते हैं। उधर यही जवाब आपको राजद वाले नेताओं से भी मिलेंगे। लेकिन सच तो यही है कि बिहार का चुनाव जाति से आगे कुछ भी नहीं। कह सकते हैं कि बिहार के अधिकतर लोग लोकतंत्र के नाम पर अपनी जाति के सरदार को चुनते हैं। उस सरदार की लोकतंत्र में क्या भूमिका होती है इससे लोगों का कोई लेना देना नहीं। जाति में बटा समाज और समाज का जातीय रंग चुनाव को चारागाह में बदल देता है जहाँ हर जातीय नेता अपनी  जाति के लोगों के सामने गिड़गिड़ाता नजर आता है।

Main
Points
जातीय राजनीति पर टिका है बिहारी समाज
बिहार में जाति नहीं तो राजनीति नहीं
कोई भी गठबंधन जाति के बिना असंभव

जाति के नाम पर बदनाम पार्टियां

आजादी के बाद से 90 के दशक तक बिहार कांग्रेस  की राजनीति से बंधा हुआ था। कांग्रेस वैसे जातीय राजनीति को इग्नोर करती है लेकिन तब भी बिहार में कांग्रेस का जातीय आधार था। सवर्ण ,दलित और मुसलमानो का थोक वोट कांग्रेस को मिलता था। कांग्रेस की राजनीति आगे बढ़ जाती थी लेकिन 90 के बाद बिहार में सब कुछ बदल गया। मंडल कमीशन के बाद बिहार में क्षेत्रीय नेताओं का उदय हुआ जो जाति के  नाम पर राजनीति को हांकते रहे।

   लालू प्रसाद यादव के राजद  की बात करें तो इसे यादवों की पार्टी कहा जाता है, जिसके पीछे मुस्लिम समुदाय की ताकत भी लगी है। वहीं सत्तारूढ़ जेडीयू को भी कुर्मी, कोइरी जाति का समर्थन प्राप्त है तो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी तो अब भी बनियों की पार्टी कहा जाता है। लेकिन इनके नेताओं से आप पूछिए तो साफ़ झूठ बोलेंगे कि वे तो विकास की राजनीति करते हैं। इसी से जुड़ा अगर आप सवाल कर दें कि बिहार  विकास कहाँ है तो इसका सही उत्तर उनके पास नहीं है। इस मामले में बिहार एक अबूझ पहेली है।

बिहार में जातीय सेना का इतिहास

दरअसल बिहार की जातीय राजनीति की शुरुआत जातीय सेना से हुई थी। पहले निजी सेनाएं बनी और जब सेना का वर्चस्व ख़त्म हुआ तो चालाक और दबंग जातीय नेताओं ने जातीय राजनीति की शुरुआत कर दी।  बिहार में निजी सेनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है।  इन्हीं सेनाओं के खूनी आतंक की वजह से बिहार को डार्क

जोन कहा जाता था। 1980 से लेकर 2000 तक बिहार निजी सेनाओं के चंगुल में फंसा था। आलम यह था कि हर जाति और समाज के लोग अपनी जिद और अहंकार की तुष्टि के लिए हथियार उठाकर सत्ता और शासन के लिए चुनौती बन गए थे। समय बदला तो इन सेनाओं की भूमिका भी बदली।

ये थी बिहार की प्राइवेट आर्मी

बिहार में सामंती दमन के खिलाफ जो पहली सेना बनी वह थी लाल सेना । यह नक्सलियों की सेना थी। गरीब भूमिहीन और छोटे किसान इस सेना में शामिल थे। इन सेनाओं के पास हथियार थे। खूब हत्याएं हुईं  और किसानों के खलिहान वर्षों तक जलते रहे। भला जमींदार पीछे कैसे रहते! नक्सलियों से लोहा लेने के लिए जमींदारों ने आवाज उठाई और नक्सलियों के खिलाफ कई सेनाओं का गठन

किया। सबसे पहले 1979 में भोजपुर में जमींदारों ने कुंवर  सेना का गठन किया। इस सेना ने भी कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया। इसी साल पटना ,गया और जहानाबाद में कुर्मी जाति के लोगों ने किसान  सुरक्षा समिति का गठन किया और लाल सेना के विरोध में आवाज उठाई। फिर 1983 में पटना,नवादा ,गया और जहानाबाद में कुर्मी जाति के किसानों नेभूमि सेना  का गठन किया। इसके बाद तो बिहार में निजी सेनाओं की बाढ़ आ गई। 

इसी साल राज्य के यादव किसानों ने लोरिक  सेना बनाई जो हथियारों से लैस थी।1984 में मध्य बिहार के भूमिहार किसानों ने अपना संगठन बनाना शुरू किया और अपनी खेती को बचाने के लिए

ब्रम्हर्षि  सेना का गठन किया। इधर  बिहार में ब्रह्मर्षि सेना का गठन हुआ और तभी दक्षिण बिहार यानी पलामू गढ़वा के इलाकों में  ठाकुर और ब्राह्मणों ने मिलकर किसान  संघ  बना डाला। कहने के लिए यह किसान संघ था लेकिन इनके पास आधुनिक हथियार थे और दहशतगर्दाें से लड़ने के लिए पूरी फौज भी थी। 1989 में सनलाइट सेना बनी। यह काफी मारक और खतरनाक सेना थी। गढ़वा, पलामू, औरंगाबाद और गया में इस सेना का काफी आतंक था। इस सेना में अधिकतर लोग मुस्लिम सामंती पठान और ठाकुर समुदाय से थे।

1990 में जहानाबाद और गया के भूमिहार किसानों ने लिबरेशनफ्रंट का गठन किया। इसी समय भूमिहार किसानों ने किसान संघ बनाया और फिर   90 में ही गंगा सेना  का गठन हुआ। इन तमाम सेनाओं के बावजूद दहशतगर्दाें के सामने वे टिक नहीं पा रहे थे। अंत में रणवीर  सेना सामने आईए जो नक्सलियों के खिलाफ सबसे ताकतवर सेना के रूप में उभरी। इस सेना की चर्चा अंतर्राष्टकृीय स्तर पर भी हुई। यह अपने आप में एक मजबूत निजी सेना थी  जिसके अपने कोष थे और हर साल नए हथियार खरीदने के लिए अकूत दौलत भी। कहते हैं कि इस

सेना की जड़ें बिहार के हर जिलें में थीं और इसका आतंक भी।  1990 से 2000 के बीच में इन सेनाओं की वजह से हजारों लोगों की लाशें गिरीं।

अब मौजूदा राजनीति का सच

निजी सेना का दमखम जब ख़त्म हो गया तो चालाक लोगों ने जातीय राजनीति के जरिए संसद से लेकर विधान सभाओं में अपनी पैठ शुरू कर दी। अभी बिहार में जो महागठबंधन है उसके सभी गुट जातीय राजनीति पर ही टिके हुए हैं। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव ने एमवाई समीकरण यानी मुस्लिम यादव गठजोड़ के दम पर ही बिहार में 15 साल तक राज किया था। आज भी आरजेडी को इसी वोट बैंक का सहारा है। वहीं करीब 25 साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस को कभी अगड़ी जाति का पूरा समर्थन प्राप्त था। लेकिन अब कांग्रेस के ट्रेडिशनल वोटर उनसे दूर जा चुके हैं।

    महागठबंधन में शामिल रहे दूसरे घटक दल, चाहे वह जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा हो या फिर मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी, ये सभी जात के दम पर ही बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं। माझी अब जदयू के पाले में चले गए हैं।

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी अब अपने ट्रेडिशनल वोटर यानी भूमिहार ब्राह्मण को अपने पक्ष में करने की कवायद शुरू कर चुकी है। बताया जा रहा है कि चुनाव में जहां आरजेडी अपने हिस्से में आने वाली ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम-यादव उम्मीदवार खड़े करेगी। वहीं कांग्रेस ने भी उनके हिस्से में आने वाले सीटों में से ज्यादातर टिकट भूमिहार ब्राह्मण को देने का मन बना लिया है।

कांग्रेस का  पतन  बीजेपी का उदय

आजादी के बाद से ही बिहार की सत्ता पर कब्जा जमाए कांग्रेसी सरकार को लालू प्रसाद यादव ने उखाड़ फेंका था। 1990 में बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का दबदबा बढ़ने के साथ ही कांग्रेस का पतन होता चला गया। 1990 के बाद 1995 के विधानसभा चुनाव में एमवाई समीकरण के दम पर लालू यादव दोबारा सत्ता में लौटे थे। इस चुनाव में कांग्रेस का लगभग सफाया हो चुका था। तब 1995 में दोबारा सत्ता में लौटे लालू प्रसाद के शासनकाल में बढ़ते अपराध से जनता त्रस्त हो चली थी। लिहाजा बीजेपी ने लालू सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इसके बाद लालू यादव के भूरा बाल साफ करो जैसे बयान पर अगड़ी जाति के लोग भड़क उठे थे। लिहाजा कांग्रेस के ट्रेडिशनल वोटर बीजेपी में शिफ्ट कर गए। अब कांग्रेस अपने उन्ही ट्रेडिशनल वोटरों अपने पक्ष में करने का भरपूर प्रयास कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अगड़ी जाति के लोग बीजेपी को छोड़ अब कांग्रेस के साथ जाएंगे।

क्यों है बिहार में जाति का महत्व

दरअसल, बिहार में अगर बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को छोड़ अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की बात करें, तो आरजेडी पर यादवों की पार्टी का ठप्पा लग चुका है, जिसे मुसलमानों का भी समर्थन प्राप्त है। आज भी आरजेडी का वोट बैंक एमवाई समीकरण ही माना जाता है। वहीं बात करें सत्तारूढ़ जेडीयू की तो लगभग 8 से 9 प्रतिशत आबादी वाले कुर्मी-कोइरी जाति पर नीतीश कुमार के पार्टी का दबदबा है। दूसरी तरफ बिहार में 17 प्रतिशत दलितों की आबादी पर रामविलास पासवान पार्टी एलजेपी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने नजरे गड़ा रखी है। इसके अलावा बिहार में पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा 4 प्रतिशत आबादी वाले कुशवाहा जाति की ही राजनीति करते हैं। यानी कहा जा सकता है कि बिहार में विकास के साथ-साथ जात को साधना भी राजनीतिक महत्व रखता है।

बिहार का जातीय गणित

जाति आधारित राजनीति के लिए मशहूर बिहार में अगर वोट की जातिगत स्थिति पर गौर करें तो सबसे ज्यादा 51 प्रतिशत आबादी ओबीसी की है। वहीं 14.4 प्रतिशत यादव, 6.4 प्रतिशत कुशवाहा-कोइरी, 4 प्रतिशत कुर्मी और करीब 16 प्रतिशत आबादी दलितों की है। बिहार में सवर्णों की आबादी करीब 17 प्रतिशत है, जिनमें से भूमिहार 4.7 प्रतिशत, ब्राह्मण 5.7प्रतिशत, राजपूत 5.2 प्रतिशत और कायस्थ 1.5 प्रतिशत हैं। वहीं सूबे में 16.9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी भी मौजूद है।

इसी जातीय गणित को साधने के लिए सभी राजनीतिक दाल नर्तन करते नजर आते हैं और चुनाव से पहले वादे और चुनाव बाद जनता से दूरी  बनाकर सिर्फ अपने लाभ के कारोबार में लग जाते हैं। बिहार का मौजूदा सच यही है और शायद यह आगे भी चलता रहे।

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