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कोरोना वायरस: कच्चे मांस का पूंजीवादी मायाजाल और बिलखती दुनिया


Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 29 Apr, 2020 | 1:25 pm

जिधर देखो ,मौत का तांडव। दुनिया के अब बहुत कम देश ही बचे हैं जहां के लोग मौज मस्ती कर रहे हों। कोरोना ने सबको बौना कर दिया है। कल तक जो दुनिया मुस्कुरा रही थी ,आज वहाँ से चीखें निकल रही है। कोरोना वायरस ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशो के साथ ही गरीब और लाचार देशों को एक साथ खड़ा कर दिया है। क्या विकसित और क्या विकासशील और क्या तीसरी दुनिया के देश ,सब एक ही कतार में खड़े त्राहिमाम करते नजर आ रहे हैं। कोरोना ने किसी को नहीं छोड़ा। इतिहास के पन्नो को पलटिये तो दुनिया के देशों में फैले महामारियों की बहुत सारी  गाथाये मिल जाएँगी और किस तरह कई देश महामारियों से बर्वाद हुए उसे जानकार सिहरन भी पैदा हो जाती है।   पूर्व में  फैले महामारियों और उन महामारियों से मरने वाले लाखों करोडो लोगो की दास्तान की मर्माहित कहानियां भी  आपको मिल जाएँगी।   लेकिन 21 वीं सदी में कोरोना के  इस  विश्वव्यापी प्रकोप ने  विज्ञानं ,वैज्ञानिक और आधुनिकतावादियों को भी परेशान  कर रखा है। इस कोरोना वायरस के सामने विज्ञानं नतमस्तक है। जो विज्ञानं कल तक सब कुछ पर फतह पा लेने का गुमान भर रहा था कोरोना ने उसे अपनी औकात बता दी है।

Main
Points
प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया जा सकता कोरोना
खुद ब खुद (म्यूटेशन) से विकसित होता है कोरोना
पशुओं के औद्योगिक उत्पादन वाली जगहों पर होता है म्यूटेशन
सार्स कोरोना ने 2003-2004 में काफी लोगो की ली थी जान

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश कहे जाने वाला अमेरिका बर्बादी के कगार पर है। मनुष्य की हर इक्षाओं को पूरा करने का दम्भ भरने वाला अमेरिका बेचारा बना ईश्वर को पुकारता नजर आ रहा है। क्या इटली ,क्या जर्मनी ,क्या फ्रांस और क्या कनाडा। सबके सब बेचारा और अनाथ  बना ईश्वर को पुकार रहा है।  इस कोरोना वायरस ने दुनिया के विज्ञान जगत को तो ललकारा ही है  दुनिया के स्वास्थ्य जगत की पोल भी खोल दी है। भारत सरीखे विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों को पहली बार पता चला है कि सिर्फ राजनीति करने और सत्ता सरकार बनाने की चाहत से ही जनता की सेवा नहीं की जा सकती। जबतक मानव समाज के लिए  स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था नहीं जाएगी तबतक इंसान को बचाना मुश्किल है। जब बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश भी लाचार है तब भारत जैसे गरीब देश की बात कौन करे। जिस देश में एक लाख से ज्यादा लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है उस देश की सारी विकास गाथा किसी राजनीतिक स्टंट से कम नहीं।

तो कहानी ये है कि कोरोना के पीछे का सच क्या है ? पहली बात तो यह है कि Scripps Research Institute सहित कई प्रतिशिष्ट प्रयोगशालाओं ने कोविड-19 की जीन संरचना का अध्ययन करके यह साबित किया है कि इसे प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया जा सकता। इसलिए यह खुद ब खुद विकसित (म्यूटेशन) हुआ है। यानी इसके पीछे किसी देश का हाथ नहीं है। यह कोरोना परिवार का ही नया वाइरस है। इसी परिवार के सार्स ने 2003-4 में भी दुनिया के कई देशों में तबाही मचायी थी। यह कोविड 19 सार्स-2 है।

कहा जाता है कि चीन के वूहान शहर से इसकी शुरूआत हुई (हालांकि प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘लैन्सेट’ के अनुसार शुरूआती 43 कोराना के मरीजों में से 13 मरीज वूहान के बाहर के थे और उनका वूहान के कोरोना मरीजों से या वहां के ‘वेट मार्केट’ से कोई सम्पर्क नहीं था)। दूसरी कहानी मीडिया में यह है कि यह वायरस वहां के वेट बाजार ( मछली व तरह तरह के मांस बेचने वाले छोटे मार्केट जैसे अपने यहां का मछली बाजार) से यह पूरी दुनिया में फैला।  लेकिन Scripps Research Institute ने अपने अध्ययन में इससे इंकार किया है। उसके अनुसार कोविड 19 जिस तरह विकसित (म्यूटेशन) हुआ है और जिस तरह की उसकी जीन संरचना है, उसके लिए पशुओं की उच्च जनसंख्या घनत्व जरूरी है। और यह पशुओं के औद्योगिक उत्पादन वाली जगहों पर ही संभव है। जहां उन्हें ठूंस ठूंस कर रखा जाता है। चिकन और सूअर का उत्पादन विशेष तौर पर ऐसे ही परिस्थितियों में होता है। रिसर्च में यह कहा गया है कि चुंकि सूअर की प्रतिरोधक क्षमता प्रणाली (इम्यून सिस्टम) इंसान से अपेक्षाकृत ज्यादा मिलता है, इसलिए यह कोविड 19 सूअर के माध्यम से ही मनुष्य में आया है। इस क्षेत्र में काम करने वाली मशहूर वेबसाइट grain.org का यह दावा भी सही लगता है कि कोरोना के बहाने वूहान के ‘वेट मार्केट’ को बन्द कराने की साजिश के तहत यह प्रचार किया जा रहा है, क्योकि इस मार्केट के माध्यम से लाखों छोटे लोगों की जीविका चलती है और गरीब लोगों को सस्ता मीट उपलब्ध होता है। जाहिर है बड़े मीट उद्योगों का हित इसी में है कि यह वेट मार्केट बन्द हो जाय और उनका अपना मार्केट और ज्यादा विस्तृत हो जाय।

इससे पहले कोरोना परिवार के सार्स कोरोना ने भी 2003-2004 में काफी लोगो की जान ली थी। यह वायरस पशुओं से ही मनुष्यों में आता है। इससे पहले स्वाइन फ्लू  ने भी पूरी दुनिया में लाखों की जान ली थी । यह मैक्सिको से शुरू हुआ था और शुरू में इसे भी उसी तरह ‘मैक्सिकन फ्लू’ का नाम दिया गया जैसे आज कोरोना को ‘चाइनीज कोरोना’ कहा जा रहा है। लेकिन ‘स्वाइन फ्लू’ के बारे में अब काफी कुछ पता चल गया है। यह औद्योगिक उत्पादन वाले सूअरों से मनुष्यों के बीच आया। मैक्सिको के एक सूअर मीट उद्योग से इसकी शुरूआत हुई। इस सूअर मीट उद्योग का नाम था-‘स्मिथफील्ड फूड कम्पनी’। यह अमरीकी कम्पनी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सूअर मीट उत्पादन व उसका प्रसंस्करण करने वाली कम्पनी है। इसके विभिन्न प्लान्टों में हर साल 28 मिलीयन सूअरों को काटा जाता है और पूरी दुनिया में अनेक रूपोें में (हाम, सासेस बेकन आदि) उसकी सप्लाई होती है। इसकी प्रमुख खरीददार कम्पनी है- मैकडानण्ड, केएफसी आदि। ये भी अमेरिकी कम्पनियां है। जैसे सभी अमरीकी कम्पनियां मसलन एप्पल, पेप्सी, नाइक, जनरल मोटर्स आदि ने चीन के सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए अपना प्लान्ट चीन में स्थापित किया है, वैसे ही इस कम्पनी का एक बड़ा प्लान्ट चीन में भी है। दुनिया की पांचवी सूअर मीट उत्पादन करने वाली डेनमार्क की कम्पनी ‘डानिस क्राउन’, सूअर मीट उत्पादन में दुनिया की सातवी बड़ी कम्पनी जर्मनी की ‘टोनी’ इन सभी के चीन में मीट उत्पादन व प्रसंस्करण के बड़े बड़े प्लान्ट हैं। यहां से यह मीट चीन के बाजारों सहित पूरी दुनिया के बाजारों में सप्लाई होता है। ‘मैकडोनाण्ड’ और ‘केएफसी’ जैसी कम्पनियां इसके प्रमुख खरीददार हैं। जाहिर है चीन की कम्पनियां भी इस दौड़ में शामिल हैं। 2008 की मंदी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी निवेशक कम्पनी ‘गोल्डमान साश ’ ने अपने इन्वेस्टमेंट को विविध करने के प्रयास में 300 मीलियन डालर का निवेश करते हुए चीन के 10 बड़े पाल्ट्री फार्म पर कब्जा जमा लिया। इसके अलावा चीन के सूअर उद्योग में भी इसका लगभग 200 मीलियन डालर का निवेश है। इसके अलावा दूसरी बड़ी अमरीकी कम्पनी ‘ओएसआई’ से जुड़ा एक मामला पिछले दिनों काफी चर्चा में रहा। यह कम्पनी चिकन मीट को प्रोसेस करती है और इसके भी चीन में 10 बड़े प्लान्ट है। यह भी मैकडानण्ड व केएफसी जैसी अमरीकी कम्पनियों के माध्यम से ही चीन सहित दुनिया के बाजारों में मीट के विविध रूपों की सप्लाई करती है। इसने सड़े मास को प्रोसेस करके चीन के मार्केट में इसकी सप्लाई कर दी थी। जिसके कारण चीन ने इस पर बड़ा जुर्मान ठोका और 10 कर्मचारियों को जेल भेज दिया।

यह डिटेलिंग इसलिए जरूरी है ताकि हम देख सके कि दुनिया के लगभग 945 बिलियन डाॅलर के मीट व्यापार में अमरीकी और अन्य योरोपीय देशों की हिस्सेदारी क्या है और चीन के साथ इसका रिश्ता क्या है।

आइये अब नज़र डालते हैं कि यहां उत्पादन कैसे होता है। 1906 में अप्टन सिंकेलयर का प्रसिद्ध उपन्यास ‘जंगल’ आया था। इसमें अमरीकी मीट उद्योग का बहुत ही ग्राफिक वर्णन मिलता है। उसकी एक पंक्ति आज भी मुझे याद है। लेखक कहता है कि यहां सूअरों की चीख के अलावा सब कुछ बेच दिया जाता है। लेकिन आज मामला ‘जंगल’ से भी आगे निकल चुका है। आज उद्योगों में जिस तरह जूते कपड़े बनाये जाते है, ठीक उसी तरह से यहां जीवित पशुओं जैसे सूअर, चिकन आदि का उत्पादन किया जाता है। विभिन्न तरंह की एण्टी बायोटिक दवाओं, हार्मोन्स व जेनेटिक इंजिनियरिंग के सहारे इनका उत्पादन किया जाता है (इसलिए अब तो इन्हें चीखने की भी इजाजत नही हैं या यो कहें कि चीखना इनके जीन में है ही नही)। जल्दी बड़ा करने के लिए तमाम तरह की दवाएं उन्हें दी जाती है। क्योकि वे जितनी देर में बड़े होंगे उतना ही लागत बढ़ जायेगी। लागत घटाने के लिए ही इन्हें झुण्ड के झुण्ड साथ रखा जाता है जहां उनका हिलना डुलना भी मुश्किल होता है। पूंजीवादी तर्क के अनुसार उत्पादन लागत को कम करने के लिए ये लगातार उनकी जीन संरचना में बदलाव करते रहते है। उदाहरण के लिए- मुर्गे के पंख को हटाना एक अतिरिक्त काम होता है। जिसमें श्रम व समय दोनो जाया होता है। इसलिए उनके जीन में इस तरह का परिवर्तन किया जाता है कि पंख कम से कम हो। इसी तरह पूरी दुनिया में चिकन सूअर व अन्य जानवरों के अलग अलग अंग भी पैक करके बेचे जाते है, जैसे मुर्गे का ‘लेग पीस’। इसलिए इन जानवरों में इस तरह का परिवर्तन किया जाता है कि सभी पशुओं की साइज (व उनके खास अंगों की साइज) लगभग एक बराबर हो यानी उनमें एकरूपता रहे, नही तो उन्हें तौलने का एक अन्य काम जुड़ जायेगा।

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