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लॉकडाउन में मिल रही सैलरी पर आया संकट! सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला!


Viplav Awasthi
Viplav Awasthi | 27 Apr, 2020 | 12:57 pm

लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को वेतन देने और नौकरी से न हटाने के गृहमंत्रालय के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए गृहमंत्रालय के आदेश को संवैधानिक मापदंडों के विपरीत बताया गया है। याचिकाकर्ता कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि कर्मचारियों को नौकरी से न निकालने और हर महीने तनख्वाह देने का आदेश, कर्मचारियों के काम करने या न करने के सिद्धांत के खिलाफ है।

Main
Points
लॉकडाउन में कर्मचारियों को सुरक्षित रखने के फैसले को SC में चुनौती
निजी कंपनियों के कर्मचारियों को सैलरी देने और काम से न निकालने के खिलाफ याचिका
निजी कंपनियों ने सरकार के फैसले को बताया असंवैधानिक
बिना काम के कर्मचारियों को सैलरी देने को बाध्य नहीं- कंपनियां

क्या था गृहमंत्रालय का आदेश

29 मार्च को केन्द्रीय गृहसचिव के जारी आदेश में कहा गया कि डिजॉस्टर मैनेंजमेंट एक्ट 2005 के तहत लॉकडाउन से जिस तरह की परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसे देखते हुए निजी कंपनियों को ये निर्देश दिया जाता है कि वो लॉकडाउन के दौरान न तो अपने कर्मचारियों को निकालेंगे, साथ ही कर्मचारियों के वेजेस का भी समय पर भुगतान करेंगे। गृहमंत्रालय के 29 मार्च के फैसले के बाद राज्यों के श्रम एंव रोजगार सचिवों ने भी अपने राज्यों की निजी क्षेत्रों की कंपनियों को निर्देश जारी किए थे।

गृहमंत्रालय का आदेश संविधान के विपरीत

कर्नाटक की एक कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए कहा कि उसकी कंपनी में फिलहाल 176 कर्मचारी स्थाई जबकि 939 कर्मचारी संविदा पर काम कर रहे हैं। 29 मार्च के गृहमंत्रालय और श्रम एंव रोजगार सचिव के आदेश के मुताबिक मार्च के वेज का भुगतान कर दिया गया जबकि लॉकडाउन के कारण कंपनी को 5-6 फीसदी तक का नुकसान हुआ है। साथ ही सरकार के आदेश आने के बाद कर्मचारियों ने ये समझा कि अब उन्हें काम करने की जरुरत नहीं है, जबकि उनकी तनख्वाह सरकार के आदेश से मिल ही जाऐगी।

याचिका में कहा गया कि सरकार का ये आदेश इस मायने में भी एक दूसरे से विपरीत था कि जो कर्मचारी काम कर रहे हैं उन्हें तो सैलरी देनी है, लेकिन जो कर्मचारी कंपनी में काम नहीं करना चाहते, उन्हें सैलरी देने के लिए बाध्य कैसे किया जा सकता है? सरकार का आदेश “ Equal Work, Equal pay” के खिलाफ जाता है।

सरकार प्राईवेट कंपनी को नहीं कर सकती बाध्य

याचिका में दावा किया गया है कि संविधान के मुताबिक सबको व्यापार करने और आजीविका कमाने का हक है। सरकार किसी भी निजी व्यक्ति की आजीविका और व्यापार में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। साथ ही सरकार के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो किसी निजी संस्था को अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए बाध्य करे। निजी संस्थाऐं खुद अपना व्यापार करती हैं और उस व्यापार में कार्य करने वाले लोगों को मेहनताना देती हैं। सरकार किसी भी कानून के तहत बाध्य नहीं कर सकती कि वो बिना व्यापार चले, अपने कर्मचारियों को वेतन दे।

“लोगों का भरण-पोषण सरकार की जिम्मेदारी”- वकील अनिल कर्नवाल

सुप्रीम कोर्ट के वकील अनिल कर्नवाल के मुताबिक “सरकार का ये आदेश पूरी तरह से कानून के खिलाफ है। सरकार जिस Disaster Management Act 2005 ("DMA 2005")  का हवाला देकर निजी क्षेत्र की कंपनियों पर आर्थिक भार डाल रही है उसमें कहीं भी ये प्रावधान नहीं किया गया है”।

वकील अनिल कर्नवाल प्रश्न करते हैं कि “ क्या सरकार इसी तरह निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था लागू कर सकती है? ये पूरी तरह से गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक होगा”।

वो आगे कहते हैं “ भारत एक लोकहितकारी राज्य है, अगर लॉकडाउन जैसी इंमरजेंसी आयी है तो केन्द्र और राज्य सरकारों की ये जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वो आगे आकर अपने नागरिकों के लिए साधन, सुविधा उपलब्ध करायें”। अमेरिका और यूरोप का उदाहरण देते हुए अनिल कर्नवाल कहते हैं, “ भारत की तरह ही दुनिया के तमाम मुल्क कोरोना जैसी महामारी से तबाह हो गये हैं लेकिन उन्होंने अपने नागरिकों की जिम्मेदारी उठाते हुए हर नागरिक को एक पैकेज दिया है, जिससे वो इस आपातकाल की स्थिति में अपने जीवन को चला सकें। भारत की सरकार को भी इसी पैकेज का ऐलान करना चाहिए, न कि निजी कंपनियों पर जिम्मेदारी डालकर दूर खड़े हो जाना चाहिए था”।

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Corona   |  Lockdown   |  Supreme court   |  salaryd   |  eduction   |  Govtemployee

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