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आखिर कैसे हुई भारतीय संसद में शून्यकाल की शुरुआत

संसद का हम सबके जीवन में बेहद अहम रोल है। देश के लिए कानून और नीतियां बनाने का काम होता है संसद में। इन्हीं कानूनों से हमारा-आपका जीवन सुरक्षित रहता है। नीतियां हमारी जिंदगी को खुशहाल बनाने में मदद करती हैं। इसी कारण आपको संसद के कामकाज में रुचि होनी चाहिए और सांसद के कामकाज पर निगाह भी। पार्लियामेंट्री बिजनेस इन दोनों ही कामों में आपकी मदद करता है।

PB Desk
PB Desk | 08 Oct, 2020 | 6:31 pm

शून्यकाल सवाल करने का ही एक और मंच है। जैसा कि नाम से महसूस होता है, वैसा कुछ है नहीं। इस प्रक्रिया के नाम में शून्य महज सिंबोलिज्म है। संसद में प्रश्नकाल की तरह ही यह भी सांसदों के लिए अपनी बात रखने का एक अहम मंच होता है। तमाम तरह के मुद्दे सांसद शून्य काल के तहत उठा सकते हैं। इस बार मानसून सत्र में जब प्रश्नकाल स्थगित कर दिया, तब भी शून्यकाल को बनाए रखा गया और कई दिनों में इसके दौरान अहम मसले भी उठाए गए। जीरो आवर या शून्यकाल भारतीय संसद से ही निकला एक आइडिया है। इसकी शुरुआत भारत में हुई। हालांकि शून्यकाल का जिक्र संसद की कार्यवाही की प्रक्रिया में कहीं नहीं है। ‘जीरो आवर’ का आइडिया संसद के पहले दशक में निकला, जब सांसदों को राष्ट्रीय और अपने संसदीय क्षेत्र के अहम मुद्दों को उठाने की जरूरत महसूस हुई। ये भी कहा जाता है कि ये नाम अख़बारों का दिया हुआ है। शुरुआत के दिनों में संसद में एक बजे लंच ब्रेक हुआ करता था। ऐसे में सांसदों को दोपहर 12 बजे बिना किसी पूर्व नोटिस के राष्ट्रीय मुद्दे उठाने का अच्छा मौका मिल जाता था। इस दौरान उन्हें एक घंटे का लंबा वक्त मिल जाता था। धीरे-धीरे ये घंटा ‘जीरो आवर’ के तौर पर जाना जाने लगा। लोकसभा और राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी जीरो आवर की कार्यवाही को भी प्रसारित करने का निर्देश देने लगे, ताकि इसे और प्रभावी बनाया जा सके। 

Main
Points
शून्यकाल भी संसद में सवाल करने का मंच
नियमों में जीरो आवर का कहीं नहीं है उल्लेख
जनता से हित से जुड़े मुद्दे उठाए जाते हैं

शून्यकाल को बनाया गया अधिक न्यायसंगत

छठी लोकसभा के दौरान प्रश्नकाल के बाद सांसद देश और दुनिया से जुड़े सवाल पूछने लगे। धीरे-धीरे अन्य सदस्यों ने भी सवाल पूछना शुरू कर दिया। हालांकि शुरुआत में शून्यकाल में ज्यादा समय नहीं लगता था। सातवीं और आठवीं लोकसभाओं में शून्यकाल पांच से 15 मिनट तक ही चलता रहा। नौवीं लोकसभा में अध्यक्ष रवि राय ने शून्यकाल को न्यायसंगत और सम्माननीय बनाने का फैसला लिया। नतीजा ये हुआ कि शून्यकाल एक घंटे से कहीं अधिक तक चलने लगा। ऐसा भी देखा गया कि कभी-कभी यह दो-दो घंटे या उससे भी अधिक देर तक चला। यहां एक एक रिकॉर्ड भी जान लीजिए। 17वीं लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। उन्होंने 4 घंटे 48 मिनट तक जीरो आवर चलाया। 

पब्लिक इंट्रेस्ट से जुड़े सवाल पूछे जाते

अब तक आप समझ गए होंगे कि शून्यकाल की अहमियत क्या है और यह कब होता है। अब समझने की कोशिश करते हैं कि शून्यकाल में किस तरह के मदुदे उठाए जा सकते हैं। सांसद अपने क्षेत्र की समस्या से लेकर किसी एेसी समस्या तक के बारे में शून्यकाल में बात कर सकते हैं जिसका लोगों की जिंदगी से सीधा संबंध हो। संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान उन सवालों को पूछा जा सकता है, जिसके लिए इंतजार नहीं किया जा सकता। पब्लिक इंट्रेस्ट से जुड़े सवालों को पूछा जाता है। हालांकि शून्यकाल के दौरान पूछे जाने वाले सवालों के लिए पहले से नोटिस देने की जरूरत नहीं पड़ती, जैसा कि प्रश्नकाल के दौरान उठाए जाने वाले सवालों के लिए पड़ती है। प्रश्नकाल के दौरान पूछे जाने वाले सवालों के लिए 10 दिन पहले नोटिस देना होता है। 

सुबह 10 बजे से पहले करना होता है सूचित

शून्यकाल में उठाए जाने वाले सवालों के लिए सांसदों को लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन को 10 बजे से पहले जि‍स महत्वापूर्ण वि‍षय को सभा में उठाना चाहते हैं, उसके बारे में साफ-साफ बताते हुए सूचना देनी होती है। इसे शॉर्ट नोटिस कह सकते हैं। हालांकि सदन में ऐसे मामले को उठाने या नहीं उठाने की अनुमति देना या न देना लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति पर निर्भर करता है। वर्तमान में शून्यकाल के दौरान लॉटरी से हर दिन 20 मामले उठाए जाने की अनुमति है। हालांकि कौन से सवाल पहले पूछे जाएंगे, यह फैसला अध्यक्ष के विवेक पर है। कहते हैं कि लॉटरी वाला सिस्टम इसलिए लाया गया, क्योंकि शून्यकाल के दौरान इतने सवाल आ जाते हैं कि सभी सवालों को नहीं लिया जा सकता।

जो सवाल नहीं पूछे गए, वह रखे हुए मान लिए जाते

कुछ समय से ये भी देखने को मिला है कि शून्यकाल के दौरान निर्धारित समय पर नहीं पूछे जा सके सवाल शाम छह बजे लिए जाते हैं या सभा के नियमित कार्य के बाद लिए जाते हैं। एक सप्ताह में सिर्फ एक सवाल शून्यकाल के दौरान कोई सदस्य पूछ सकता है। आमतौर पर एक सदस्य को सवाल पूछने के लिए तीन मिनट का समय दिया जाता है। जो सवाल नहीं पूछे गए, लेकिन उन सवालों को 10 बजे से पहले लोकसभा और राज्यसभा अध्यक्ष को भेजा गया था, उन्हें भी सदन के पटल पर रखा मान लिया जाता है। शून्यकाल के दौरान पूछे गए सवालों के जवाब संबंधित विभागों से जुड़े मंत्री मौखिक या लिखित में दे सकते हैं। जरूरी नहीं कि जिस दिन सवाल पूछा गया है, उसी दिन सरकार की ओर से जवाब भी मिले। संसद के उस पूरे सत्र के दौरान कभी भी शून्यकाल के दौरान पूछे गए सवालों के जवाब दिए जा सकते हैं।

Tags:
Indian Parliament   |  Zero Hour   |  Sansad

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