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क्या हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से बढ़ता है मौत का खतरा? जानें!

कोरोना से लड़ाई में अभी तक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को बहुत उपयोगी माना जा रहा था, लेकिन अमेरिका के एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है कि इसके इस्तेमाल से मरने का खतरा और बढ़ जाता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) और यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है।

Suyash Tripathi
Suyash Tripathi | 23 Apr, 2020 | 4:35 pm

कोरोना महामारी दिन-ब-दिन और भयावह रुप लेता जा रहा। विश्वभर की रिसर्च टीमें, मेडिकल स्टाफ कोरोना का तोड़ खोजने में जुटे हैं, लेकिन अभी तक कोई पुख्ता इलाज हाथ नहीं लग पाया है। हालांकि दुनियाभर में कई जगहों पर कोरोना वैक्सीन को लेकर ट्रायल चल रहे है, जिनके काफी हद तक सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। भारत सरकार ने भी साफ किया है कि जी-20 देशों के साथ मिलकर भारत कोरोना वैक्सीन पर रिसर्च करेगा। इससे पहले भारत सरकार दुनियाभर के कई देशों को पहले ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और पैरासीटामॉल जैसी दवाईयां मुहैया करा चुका है जो कोरोना से जंग में अभी तक काफी कारगर साबित हो रही थीं। लेकिन अमेरिका के एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है जिसमें कहा गया है कि सामान्य इलाज की तुलना में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा लेने वाले मरीजों की मौत ज्यादा हो रही है।

Main
Points
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवाओं को कोरोना के इलाज में उपयोगी माना जा रहा था
अमेरिका के एक नई स्टडी में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को हानीकारक बताया गया है
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) और यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के शोधकर्ताओं ने दी थ्योरी
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की वजह से करीब 28 फीसदी कोरोना मरीजों की हुई मौत
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को बताया था गेमचेंजर

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन पर अमेरिका की नई थ्योरी-

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) और यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन कोरोना मरीजों का इलाज सामान्य तरीकों से हो रहा है, उनके मरने की आशंका कम रहती है। जबकि, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा का उपयोग करने पर मरीजों की ज्यादा मौत हुई है। इस स्टडी में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा से करीब 28 फीसदी कोरोना मरीजों की मौत हो रही है। जबकि, सामान्य प्रक्रिया से इलाज करते हैं तो सिर्फ 11 प्रतिशत मरीज ही अपनी जान गवां रहे हैं।

NIH और यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया का रिसर्च-

NIH और यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के वैज्ञानिकों की टीम ने 368 कोरोना मरीजों के ट्रीटमेंट प्रक्रिया की जांच की, इनमें से कई मरीज या तो मर चुके थे, या फिर ठीक होकर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिए गए थे। इस जांच में पता चला कि 97 मरीजों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दी गई, 113 मरीजों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के साथ एजिथ्रोमाइसिन दी गई, जबकि, 158 मरीजों का इलाज सामान्य तरीके से किया गया और उन्हें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा नहीं दी गई। जिन 97 मरीजों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा दी गई थी, उसमें से 27.8% मरीजों की मौत हो गई। जिन 113 मरीजों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा के साथ एजिथ्रोमाइसिन की दवा दी गई थी उनमें से 22.1% मरीजों की मौत हो गई। जबकि, उन 158 मरीजों की बात करें तो जिन्हें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की दवा नहीं दी गई, उनमें सिर्फ 11.4% मरीज ही मारे गए।

शोधकर्ताओं में मतभेद-

कोरोना के कारण दुनियाभर में अब तक 18 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं और करीब 23 लाख के करीब लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। ऐसे में पुख्ता इलाज की कमी के कारण हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवाओं के उपयोग के अलावा कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। जारी किए गए अध्ययनों में से कोई भी दवा की प्रभावशीलता सटीक न होने के कारण हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन एक मात्र आशा का किरण शाबित हो रहा है। आरसीटी परिक्षण लगातार चल रहे हैं और उम्मीद यही लगाई जा रही है कि जल्द ही कोरोना का इलाज संभव हो पाएगा।

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Corona   |  Corona pandemic   |  hydroxy chloroquine   |  NIH   |  University   |  of   |  Virginia   |  Donald Trum

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