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लॉकडाउन के दौरान आपका बच्चा भी चिड़चिड़ा हो रहा है? जानें कारण

लॉकडाउन के चलते बस्तियों के बच्चों को मन बहलाने के उपायों से ज़्यादा भूख बना रही है चिड़चिड़ा

Archna Jha
Archna Jha | 18 Apr, 2020 | 3:59 pm

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कोविड-19 के लगातार बढ़ते मामलों की रोकथाम के लिए 25 मार्च से देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया जो बेशक ही सरकार का एक उचित कदम है, लेकिन इसका विपरित असर कहीं न कहीं बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी पड़ रहा है जिसे अनदेखा नही किया जा सकता। यदि बच्चों के पहलू से सोचा जाए तो स्कूल, पार्क, डांस क्लास, स्पोर्टस् सब बंद हैं, दोस्तों से मिल नही सकते, सारा दिन पढ़ाई कर नहीं सकते, टी.वी. और कंप्यूटर पर भी पूरा दिन बिताना संभव नही ऐसे में उनका चिड़चिड़ा होना स्वाभाविक है। हालात ऐसे हो गए हैं कि बच्चे न केवल माता-पिता पर चिल्लाते हैं बल्कि उनके साथ हाथापाई तक करने लगे हैं। इतना ही नहीं बच्चे खुद को चोट पहुंचाने की मानसिक दशा से भी गुज़र रहे है। दूसरी ओर, ऐसे में माता-पिता भी एकसाथ घर व दफ्तर के कामों और लॉकडाउन के चलते अन्य समस्याओं में सामंजस्य नही बिठा पा रहे हैं। जिसका गुस्सा बच्चों को हर बात में टोक कर, डांटकर या पीटकर निकालते हैं।

Main
Points
लॉकडाउन में बंद स्कूलों, पार्कों ने बढ़ाया बच्चों में चिड़चिड़ापन
बच्चे माता-पिता के गुस्से का भी शिकार बन रहे हैं
घर से भाग जाने जैसी मानसिक दशा से गुज़र रहे हैं बच्चे
विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनीसेफ ने दिए पेरेंटस् को इस स्थिति का सामना करने के सुझाव
बच्चों की जगह खुद को रखकर सोचें माँ-बाप - बाल मनोचिकित्सक

चाइल्ड हेल्पलाइन पर बच्चे कर रहे हैं शिकायत

दिल्ली के रोहणी से एक मामला सामने आया जिसमें 12 वर्षीय राहुल (बदला हुआ नाम) ने चाइल्ड हेल्पलाइन नबंर पर कॉल कर बताया कि उसके पिता ऑफिस न जा पाने की स्थिति में सारा दिन घर पर शराब पीते हैं और उसे व उसकी माँ को पीटते हैं, अब वह उस घर में नही रहना चाहता और आकर उसे ले जाया जाएं, नही तो वह कहीं भाग जाएगा। 

बाल अधिकार सुरक्षा आयोग, इलाहाबाद के अध्यक्ष अरुण शर्मा का कहना है- “हालात इतने जटिल होते जा रहे हैं कि हमारे पास केवल पेरेंटस् के ही नही बल्कि सैंकड़ो बच्चों के कॉलस् भी आ रहे हैं।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनीसेफ और अन्य संगठनों जारी किए सुझाव 

बच्चों से दिमाग शांत रखकर बात करें, उनकी जरुरतों को सुनें, उनके कामों की प्रशंसा करें, पूरा परिवार एकसाथ योगा करे, छोटे बच्चों को हाथ-धोने के लिए प्रेरित करने को कोई धुन बजाएं, टीनेज बच्चों को ध्यान से सुनें, अभी उनकी परेशानियों को समझने वाले केवल उनके पेरेंटस् ही हैं।

क्या कहते हैं बाल मनोरोग विशेषज्ञ

बच्चों में इस व्यवहारिक बदलाव में संतुलन लाने के बारे में रोहिणी, दिल्ली की चाइल्ड साइकोलोजिस्ट रिपन बैनर्जी का कहना है- “ऐसी स्थिति में माता-पिता बच्चों संग अपना बचपन शेयर करें, कैद में रहने जैसे अहसास से बच्चों को मुक्त करें, कोरोना के बारे में उन्हें डरावने ढ़ग से न बतायें, धैर्य से समझाएं कि घर में रहकर न केवल वे सुरक्षित हैं, बल्कि उनके दोस्त भी, स्कूल रुटीन के मुताबिक ही उनसे पढ़ाई करवाएं, कभी घर के छुटपुट काम में सहायता लेकर उनका मन लगाएं, पौधे लगवाएं, कभी उनके साथ गाने गायें, यदि बच्चों के स्थान पर खुद को रखकर सोचेंगें, तो पेरेंटस् का नज़रिया भी बदलेगा”।

वहीं मनोचिकित्सक डॉक्टर रश्मि कहती हैं- “ ये वक्त है जब माता-पिता और बच्चों के रिश्ते गहरे होने की ज़रुरत है, अपने छोटे बच्चों को समझाएं कि लॉकडाउन क्या है? वे घर से क्यों नही निकल सकते? या दोस्तों से क्यों नही मिल सकते? उन्हे समझाएं कि लॉकडाउन का पालन करना क्यों ज़रुरी है?”

लॉकडाउन के चलते बस्तियों के बच्चों की मानसिक स्थिति

इस बारे में प्रयागराज स्थित एक एनजीओ ‘शुरुआत: एक ज्योति शिक्षा की’ के संस्थापक अभिषेक शुक्ला का कहना है- “ये बच्चे मध्यम-वर्गीय या अमीर परिवारों के बच्चों की अपेक्षा खुली बस्तियों में रहते हैं, दूसरी बात शायद वर्तमान परिस्थितियों में इनकी व इनके परिवार की मुख्य चिंता समय बिताने के लिए साधनों की कमी नही बल्कि पेट पालना है, जो इन्हें चिड़चिड़ा बना  सकती है, फिर भी ये बच्चे अपेक्षाकृत धैर्यवान हैं,  जो सच में एक चौंका देने वाली बात सामने आई है।“

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Covid 19   |  Lockdown   |  childern   |  changing   |  behaviour   |  WHOUNICEF   |  child physchologist

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