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भारत में सोशल डिस्टेंसिंग दरअसल ‘क्लास डिस्टेंसिंग ' है

लगता तो ऐसा है कि इस बिमारी के नाम पर गरीब ,कामगार और मेहनतकश लोग ही सरकार के निशाने पर हैं। एक तरफ कोरोना का संताप है तो दूसरी तरफ सरकारी तालाबंदी में ढील और कसाव के गेम। जगह और समय के मुताबिक यह गेम जारी है। इस गेम के क्या फायदे होंगे और किसको इस गेम का लाभ मिलेगा ,शायद ही किसी को मालूम हो। सरकार कहने को तो बहुत कुछ कहती फिरती है लेकिन सच यही है कि आज करोना के इस खेल में सबसे ज्यादा मौत के शिकार वही मजदूर और कामगार क्लास के लोग हो रहे हैं।

Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 02 May, 2020 | 3:57 pm

भारत में करोना वायरस  का प्रभाव अपने चरम की तरफ बढ़ता जा रहा है। हर रोज इस वायरस के तांडव से मौतों की सूची लंबी  होती जा रही है तो बड़ी संख्या में लोग संक्रमण के शिकार भी हो रहे हैं। तबाही का मंजर हर तरफ जारी है। एक तरफ इस वायरस का आतंक है तो दूसरी तरफ देश में जारी तालाबंदी की वजह से सारे काम धंधे बंद हैं और इस तालाबंदी की वजह से उपजी बेकारी ,भुखमरी ने लोगों के मन में  सत्ता और सरकार के प्रति नफरत का वातावरण पैदा कर दिया है। अब तीसरे लॉकडाउन की भी घोषणा हो गई है। पूरा देश कमोबेस बंद है और आगे भी कुछ छूट के साथ  देश बंद ही रहेगा। आलम ये है कि जो लोग पिछले 40 दिनों से घरों में कैद है वे मानसिक रोग के शिकार बनते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ अपना सब कुछ गवां चुके कामगार लोगों के बीच सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ रही है।

Main
Points
तालाबंदी से उपजी बेकारी ने सरकार के प्रति नफरत का वातावरण पैदा कर दिया है
40 दिनों से घरों में कैद लोग मानसिक रोग का शिकार हो रहे हैं
अत्यधिक प्रभावित है कामगार और मजदूर

     लगता तो ऐसा है कि इस बिमारी के नाम पर गरीब ,कामगार और मेहनतकश लोग ही  सरकार के निशाने पर हैं। एक तरफ  कोरोना का  संताप है तो दूसरी तरफ सरकारी तालाबंदी में ढील और कसाव के गेम। जगह और समय के मुताबिक यह गेम जारी है। इस गेम के क्या फायदे होंगे और किसको इस गेम का लाभ मिलेगा ,शायद ही किसी को मालूम हो। सरकार कहने को तो बहुत कुछ कहती फिरती है लेकिन सच यही है कि आज करोना के इस खेल में सबसे ज्यादा मौत के शिकार वही मजदूर और कामगार क्लास के लोग हो रहे हैं। वजह ये है कि इस क्लास के लोग चाहकर भी सरकारी समाजिक दूरी नियम का पालन नहीं कर सकते। भला एक कमरे ने आधा दर्जन लोगों के साथ रहकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे किया जा सकता है। 

     72 साल से आखिर हो क्या रहा है? इसी भ्रमित करने वाले गेम के जरिए ही तो सरकार बनती और बदलती हैं। 2016 की नोटबंदी वाली घटना को याद कर लीजिए तो सब कुछ साफ़ हो जाएगा।  नोटबंदी  का क्या लाभ देश और यहाँ की जनता को मिला ,आज तक किसी को पता नहीं। सरकार और उसके नुमाइंदे अब नोटबंदी  से जुड़े सवालों के जबाव नहीं देते। लेकिन प्रचारतंत्र का गेम ऐसा चला कि पूरा देश भक्तिमय हो गया। सारे सवाल या तो भक्ति में विलीन हो गए या फिर डर के साये में दफ़न हो गए । देशद्रोही होने का डर भला किसे ना हो।

   

  ज़रा इस नज़ारे को भी देखिए। जिन लोगों ने 5 अप्रैल की दिवाली को भक्तिभाव से नहीं देखा होगा उन्हें शायद यह अहसास हुआ होगा कि इस दिन भारत की औपचारिक डेमोक्रैसी, रियल इंडियोकैसी में बदल गयी। भारतीय शासक वर्गों पर गालिब का एक शेर काफी सटीक बैठता है-‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’। याद कीजिए नोटबंदी  की गाथा को । नोटबंदी  औपचारिक तौर पर इसलिए की गयी कि काला धन पकड़ में आ जाए । नोटबन्दी के बाद सारा काला धन सफेद हो गया। जितने नोट बंद  हुए थे, उससे ज्यादा बैंकों में वापस पहुंच गये। लेकिन तानाशाह की इस सनक ने करोड़ों लोगों की रोजी रोटी छीन ली और भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया।

 

     उसी तरह 24 तारीख के लाकडाउन के बाद जो स्थितियां बनी उसने कोरोना फैलाने में बेहतर मदद की। लाखों प्रवासी मजदूर ‘रिवर्स लांग मार्च’ करने को मजबूर हुए। धूप और बरसात में भूखे प्यासे ये लोग कोरोना का आसान शिकार बने हैं । चंद शेल्टर होम में लोग वैसे ही ठूसे पड़े हुए है जैसे वे अपनी मजदूर बस्तियों में रहते थे। सड़क व गांव के किनारे कई ‘क्वारन्टाइन सेन्टर’ सांप व बिच्छू का केन्द्र बने हुए है। अधिकांश क्वारन्टाइन सेन्टर वस्तुतः जेल है। जहां बिना किसी अपराध के लाखों लोगों को रखा गया है। ये सभी कोरोना के आसान शिकार हैं। हां उच्च व मध्य वर्ग जरूर अपने-अपने घरों में सुरक्षित है। तभी तो  भारत में सोशल डिस्टैन्सिंग दरअसल ‘क्लास डिस्टैन्सिग’ है। इसके पीछे का असली मकसद उच्च वर्ग-मघ्यवर्ग और गरीबों के बीच डिस्टेंस बढ़ाना है। और कोरोना को गरीबों की ओर जाने का रास्ता देना है। सड़क पर चल रहे मजदूरों ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि हमें कोरोना से उतना डर नहीं लगता ,जितना भुखमरी और पुलिस की लाठी से है। ये लाचार मजदूर खुशी खुशी अपने गांव नहीं लौट रहे है। ये उन गांवों की ओर लौट रहे हैं जहां 31 किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे है।  आखिर इनके पास चारा ही क्या है ? कम से कम घर पहुंचकर जान बच जाए यही बात मन में समा गई है। 

           भारत में 4 लाख लोग हर साल टीबी से मरते है। जिसका एक बड़ा कारण गरीबी है। यह लॉकडाउन इस गरीबी को और बढ़ायेगा। आइएलओ’ की ताजा रिपोर्ट कहती है कि लॉकडाउन के बाद भारत की 40 करोड़ जनसंख्या गरीबी के गर्त में और गहरे धंस जायेगी और टीबी से मरने वालों की संख्या इस साल बढ़ सकती है। यह रणनीति कितनी कारगर है कि हम 1 व्यक्ति को कोरोना से बचायें और बदले में 4 व्यक्ति को टीबी से मारे। इस कोरोना समय में लगभग सभी अस्पतालों की ओपीडी बन्द है। दिल्ली के एम्स जैसे अस्पताल ने अपना ओपीडी बन्द कर दिया है। कैन्सर के गम्भीर मरीजों का भी इलाज नहीं किया जा रहा है। तमाम कैन्सर के मरीज दिल्ली में एम्स व अन्य अस्पतालों के आसपास अपने मरने का ही इन्तजार कर रहे है। प्राइवेट क्लीनिक चलाने वाले ज्यादातर डाक्टरों ने अपनी खुद की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अपनी क्लीनिक बंद कर रखी है। शायद यह आंकड़ा कभी नहीं आयेगा कि हमने कितने कोरोना मरीजों को बचाया और इसके एवज में कितने अन्य बीमार लोगों को मारा। आखिर भारत कर भी क्या सकता है।

              पिछले दशकों में हमने हिन्दू-मुस्लिम करने में ही अपना वक्त गंवाया है। बाकी का हमारा काम तो विश्व बैंक, आईएमएफ जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं या अमरीका ही करता रहा है। और इनके ‘सुन्दर’ कामों का नतीजा ही है कि आज हमारे यहां 10000 लोगों पर एक सरकारी एमबीबीएस डाक्टर है। 1000 लोगो पर आधा बेड है।  बिहार के 18 जिलों में एक भी वेन्टिलेटर नहीं है। इन्हीं परिस्थितियों के कारण भारत में हर साल 5 करोड़ 5 लाख लोग सिर्फ स्वास्थ्य खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। 

               सच तो यही है कि भारत किसी भी लिहाज से कोराना जैसी महामारी के लिए तैयार नहीं था। लेकिन यहां का मीडिया हर चीज के लिए तैयार रहता है। कोरोना के लिए भी यह पहले से तैयार था। पहले अमरीका के साथ हुआं हुआ करते हुए इसने कोराना के लिए चीन को निशाना बनाया, लेकिन जब ‘वेन्टिलेटर’ और ‘टेस्टिंग किट’ के लिए भारत को चीन के सामने हाथ पसारना पड़ा तो मीडिया ने अपना अभियान बीच में रोक कर अपने पसंदीदा दुश्मन मुसलमान पर आ गया और कोराना का सारा ठीकरा मुसलमानों पर फोड़ दिया। संघ के आई टी सेल वाले भी लाॅक डाउन का पूरा इस्तेमाल करते हुए खुद कोरोना की भूमिका में आ गये हैं। और लोगों को नये सिरे से संक्रमित करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। सरकार को सीएए में मुसलमानों की भूमिका का बदला लेने का मौका मिल गया। ‘राना अयूब’ के ट्विटर हैण्डल पर जारी उस विडियों को कौन भूला सकता है जहां एक मस्जिद से निकलते हुए मुसलमानों पर पुलिस लाठियां बरसा रही है। कितने मुसलमानों और मुसलमान बस्तियों को कोरोना के कारण क्वारंटाइन किया गया और कितनों को उनके मुसलमान होने के कारण किया गया, यह अब किसी से छिपा नहीं है। जब पूरी दुनिया कोराना वायरस  के जीनोम का अध्ययन कर रही है तो हम कोरोना के धर्म के अध्ययन में लगे हुए हैं।

Tags:
ocial distancing   |  Lockdown   |  Corona Viru

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