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मुल्क की तरफ पलायन , मनीआर्डर अर्थव्यवस्था ध्वस्त

करोना महामारी ने दुनिया की तस्वीर बदल दी है। भारत में मजदूरों का शहरों की तरफ पलायन एक बुनियादी समस्या रही है लेकिन अब करोना ने मजदूरों को अपने मुल्क की तरफ लौटने को मजबूर कर दिया है। गावं में मजदूरों को सकून तो मिलेगा लेकिन मनीआर्डर अर्थयवस्था के आभाव में गावं की तस्वीर बदरंग हो सकती है

Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 06 May, 2020 | 3:46 pm

करोना महामारी ने दुनिया का नजारा ही बदल दिया है। मजदूरों और कामगारों पर टिकी दुनिया की अर्थव्यवस्था अब मजदूरों के खिलाफ होती जा रही है। भारत की हालत तो और भी बदतर है। यहां उलटी गंगा बहने लगी है। कल तक ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन शहरों की तरफ हो रहा था अब शहरों से निकल कर वही मजदूर  किसी भी सूरत में गांव भाग जाने को तैयार हैं। कामगारों को लगने लगा है कि अब उनकी जान अपने मुल्क में ही बच सकती है। उसका गांव ,समाज ही उसकी हिफाजत कर सकता है। सामाजिक रूप से उसका देस ही उसे ज़िंदा रख सकता है। भारत के कोने कोने से मजदूरों का पलायन गांव की तरफ जारी है। सरकार भी  सकते में हैं की कैसे इन मजदूरों को गावं तक पहुंचाया जाए। बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन अब गांव की तरफ हो गया है। मजदूर मानने  लगे हैं कि चाहे जैसे भी हो गांव में वे अपनी जिंदगी काट लेंगे। कल तक जिस छोटी मोटी खेती बारी से वे भाग  रहे थे, अब वही खेती बारी करके अपने परिवार को वह पाल लेगा।

Main
Points
भारत में 46.5 करोड़ कामगार हैं
41.5 करोड़ असंगठित क्षेत्र में
समूची अर्थव्यवस्था पर कामगारों के काम का पड़ता है असर

गावं और शहर के रूप बदल जायेंगे 

    रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ पलायन कल तक की ख़बरें बनती थी। पलायन तब इस देश की बड़ी समस्या थी। संसद से लेकर सड़क तक पलायन को लेकर आंदोलन चलते थे। अखवार और चैनलों पर बड़े बड़े डिबेट हो रहे थे। लेकिन अब खेल बदल गया। हालत बदल गए। करोना ने सब कुछ बदल दिया। सच यही है कि आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों के ठप पड़ने के कारण शहरों से बड़ी संख्या में श्रमिकों का पलायन जारी है।  बेरोजगारी, वेतन कटौती और मजदूरी नहीं मिलने से कामगार बदहाल हैं।  उन्हें अपने गांव-घर में ही सुरक्षा की उम्मीद दिख रही है। यह स्थिति कमोबेश लॉकडाउन के पहले दिन से ही है। 

          मजदूरों को उनके घर पहुंचाने को लेकर अब राजनीति भी जारी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष मजदूरों के सहारे एक दूसरे को नीचा दिखाने को तैयार हैं। सरकार भी बहुत कुछ कहती नजर आ रही है लेकिन मजदूर चाहकर भी गावं नहीं पहुँच पा रहे हैं।  इधर अब एक और परेशानी बढ़ी है। ये परेशानी अब लॉक डाउन में ढील होने के बाद की है। यह अब जब धीरे-धीरे कारोबार और उत्पादन को फिर से शुरू करने का सिलसिला शुरू हुआ है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उद्योगों और अन्य तरह के कामकाज के लिए समुचित संख्या में कामगार उपलब्ध हो सकेंगे।  यह सवाल संगठित क्षेत्र के लिए भी उतना ही गंभीर है, जितना कि असंगठित क्षेत्र केलिए।

जरुरत है सामाजिक सुरक्षा की 

            एक अनुमान के मुताविक  हमारे देश में 46.5 करोड़ कामगार हैं, जिनमें से41.5 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं।  ये कामगार मुख्य रूप से अपनी अनियमित कमाई पर निर्भर होते हैं और उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा का आवरण उपलब्ध नहीं है।  इनके काम का सीधा जुड़ाव संगठित उद्योगों से है, सो उनकी कमी का असर समूची अर्थव्यवस्था पर होना स्वाभाविक है। ये कामगार अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अपने गांव में परिवार के लिए भेजते हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा आधार है। इसे मनीआर्डर अर्थव्यवस्था कहा जाता है। बिहार ,यूपी ,झारखंड ,बंगाल ,ओडिशा ,मध्यप्रदेश  और छत्तीसगढ़ से लेकर पंजाब तक की अर्थव्यवस्था मनीआर्डर व्यवस्था पर चलती रही है। बाहर से आने वाले पैसों से ही घर और परिवार चलता रहा है। बता दें कि  उत्तर और पूर्वी भारत के पिछड़े राज्यों के लिए यह कमाई बहुत अहमियत रखती है।  करोड़ों श्रमिकों की वापसी गांवों के लिए भी सुखद नहीं कही जा सकती है। जब मनीआर्डर व्यवस्था टूटेगी तब देश का गावं भी परेशान होगा और गावं की तस्वीर भी बदरंग हो जाएगी। 

Tags:
Covid-19   |  Lockdown   |  Laborers   |  Money Order   |  Migrating   |  Laborer

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