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प्रकृति के लिए वरदान बना लॉकडाउन !

प्रकृति सर्वोपरि है। प्रकृति मानव समाज को बहुत कुछ देती है। प्रकृति के बिना मानव समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन जिस तरीके से प्रकृति पर मानव समाज विजयी पाने को तैयार है ,वह प्रकृति को बर्दास्त नहीं। करोना वायरस के बहाने ही लॉक डाउन से प्रकृति को सकून मिला है। अगर इंसान ने इसे नहीं समझा तो प्रकृति के अभिशाप से कौन बचेगा। करोना का यह संताप तो महज एक ट्रेलर भर है।

Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 05 May, 2020 | 1:50 pm

महामारी को भला कौन स्वीकार करेगा ! जब मानव समाज ही खतरे में हो और महामारी काबू से बाहर हो तब विज्ञानं जगत भी सकते में आ जाता है और फिर सबकी निगाहें सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की तरफ उठ जाता है। करोना वायरस के इस संधि काल में भी कुछ ऐसा ही सब होता दिख रहा है। तीसरी दुनिया को कौन कहे ,संसार के महाबली कहे जाने वाले देश और विज्ञान से सबको चकित करने वाले विज्ञानी भी इस करोना के सामने दंडवत होता दिख रहा है। जिस तरह से इस वायरस ने संसार को अपना भोजन बना रहा है उससे तो लगता है कि प्रकृति ने मानव समाज श्राप दे दिया है और शापित समाज अब प्रकृति के सामने दया की भीख माँगा फिर रहा है। जिस तरह से दुनिया में मौत का तांडव जारी है और खासकर महाबली कहे जाने वाले देश त्राहिमाम के शिकार हैं ऐसे में साफ़ हो गया है कि प्रकृति को रौंदने का अंजाम बुरा ही होता है। करोना वायरस के इस प्रकोप से मानव समाज सबक नहीं लेता है तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी मानव विहीन और बेजान हो जाएगी।

Main
Points
लॉक डाउन से प्रकृति को सकून मिला है
चीन में कार्बन उत्सर्जन में 25 फ़ीसद की कमी आई
2020 में कार्बन उत्सर्जन में 0.3% की कमी का अनुमान

प्रकृति को रौंदने का अंजाम संसार के सामने है। लेकिन इसी प्रकृति ने मानव समाज को सबक सिखाते हुए अपना एक नया संसार जीव समाज के लायक गढ़ने की शुरुआत भी कर दिया है। कह सकते हैं कि करोना वायरस मानव समाज के लिए तत्काल किसी अभिशाप से कम नहीं ,लेकिन यह प्रकृति के लिए वरदान भी सावित हो रहा है। इस करोना वायरस के आतंक  से लॉक डाउन में फसी दुनिया  की वजह से पर्यावरण  इंसान के रहने लायक होता दिख रहा है। सौ फ़ीसद सच है कि दुनिया का ये लॉकडाउन प्रकृति के लिए बहुत मुफ़ीद साबित हुआ है। वातावरण धुल कर साफ़ हो चुका है। हालांकि ये तमाम क़वायद कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए हैं।

लॉकडाउन की वजह से  संसार की लगभग तमाम फ़ैक्ट्रियां बंद हैं। फैक्ट्रियों से नदी नाले में गिरते अवशेष बंद हैं। यातायात की सुविधाएँ बंद हो जाने से वायु प्रदुषण बंद है। प्रदूषित जल अचानक साफ़ दिखने लगा है। धूलकण से भरे वायुमंडल साफ़ नजर आने लगे हैं और पर्यावरण में सुधार की वजह से ओज़ोन परत में सुधार होने की ख़बरें आ रही है। यह बात और है कि इस लॉक डाउन की वजह से  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लग रहा है।  लाखों -करोडो लोग बेरोज़गार हुए हैं।शेयर बाज़ार ओंधे मुंह आ गिरा है।  लेकिन अच्छी बात ये है कि कार्बन उत्सर्जन रुक गया है। दुनिया के कई प्रदूषित शहरों के अचानक साफ़ हो जाने की रपटें सामने आ रही है।

जिस तरह की सूचना  आ रही है उसके मुताविक  चीन में भी कार्बन उत्सर्जन में 25 फ़ीसद की कमी आई है। चीन के 6 बड़े पावर हाउस में 2019 के अंतिम महीनों से ही कोयले के इस्तेमाल में 40 फीसद की कमी आई है।  पिछले साल इन्हीं दिनों की तुलना में चीन के 337 शहरों की हवा की गुणवत्ता में 11.4 फ़ीसद का सुधार हुआ।  ये आंकड़े खुद चीन के पर्यावरण मंत्रालय ने जारी किए हैं। यूरोप की सैटेलाइट तस्वीरें ये बताती हैं कि उत्तरी इटली से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन कम हो रहा है। ब्रिटेन और स्पेन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। भारत की कई नदियां अचानक साफ़ सुथरी हो गई है। गंगा का पानी पीने लायक माना जा रहा है। जिस गंगा को साफ़ करने के लिए करोड़ -अरबों की राशि बर्वाद की गई वह गंगा अब इस करोना काल में पवित्र होती दिख रही है। 

लॉकडाउन के बाद क्या होगा ?

अब सवाल है कि  जब लॉक डाउन टूटेगा और सारी दुनिया फिर से जाग उठेगी और दौड़ने लगेगी तब क्या  रुका हुआ  कार्बन उत्सर्जन  फिर से नहीं बढ़ेगा ? साफ़ हो चली नदियाँ क्या फिर से प्रदूषित नहीं होगी ? और सबसे बड़ी बात कि क्या जब पूरी दुनिया फिर से अपने काम पर लग जाएगी तब पर्यावरण में जो बदलाव हम आज देख रहे हैं क्या वो हमेशा के लिए स्थिर हो जाएंगे? कहना मुश्किल है। स्वीडन के एक जानकार और रिसर्चर किम्बर्ले निकोलस के मुताबिक़, दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 23 फ़ीसद परिवहन से निकलता है।  इनमें से भी निजी गाड़ियों और हवाई जहाज़ की वजह से दुनिया भर में 72 फीसद कार्बन उत्सर्जन होता है।  अभी लोग घरों में बंद हैं. ऑफ़िस का काम भी घर से कर रहे हैं। निकोलस कहते हैं कि मुश्किल की इस घड़ी में हो सकता है लोग इसकी अहमियत समझें और बेवजह गाड़ी लेकर घर से निकलने से बचें। अगर ऐसा होता है तो मौजूदा पर्यावरण के हालात थोड़े परिवर्तन के साथ लंबे समय तक चल सकते हैं।  वही निकोलस ये भी कहते हैं कि बहुत से लोगों के लिए हर रोज़ ऑफ़िस आना और दिल लगाकर काम करना ही ज़िंदगी का मक़सद होता है।  इस दिनों उन्हें घर में बैठना बिल्कुल नहीं भा रहा होगा।  वो इस लॉकडाउन को क़ैद की तरह देख रहे होंगे।  हो सकता है वो अभी ये प्लानिंग ही कर रहे हों कि जैसे ही लॉकडाउन हटेगा वो फिर से कहीं घूमने निकलेंगे।  ऐसा होता है तो बहुत जल्द दुनिया की आब-ओ-हवा में ज़हर घुलने लगेगा। 

सबक लेने की जरुरत 

बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी महामारी के चलते कार्बनडाई ऑक्साइड का स्तर कम हुआ हो।  इतिहास में  इसके कई उदाहरण मिलते हैं।  यहां तक कि औद्योगिक क्रांति से पहले भी ये बदलाव देखा गया था।   यूरोप में चौदहवीं सदी में आई ब्लैक डेथ हो, या दक्षिण अमरीका में फैली छोटी चेचक. सभी महामारियों के बाद वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर कम दर्ज किया गया था।  उस दौर में परिवहन के साधन भी बहुत सीमित थे।  और जब महामारियों के चलते बहुत लोगों की मौत हो गई, तो खेती की ज़मीन भी खाली हो गई और वहां ऐसे जंगली पौधे और घास पैदा हो गए जिससे गुणवत्ता वाली कार्बन निकली।

जर्मन रिसर्चर, जूलिया पोंग्रात्स का कहना है कि अगर कोरोना वायरस की महामारी इस साल के अंत तक जारी रहती है, तो ज़ाहिर है पैसे की कमी के चलते मांग में कमी आएगी और इसका असर कार्बन उत्सर्जन पर पड़ेगा ही। वहीं, नार्वे की राजधानी ओस्लो के एक अन्य रिसर्चर का कहना है कि 2020 में अगर आर्थिक स्थिति बेहतर हो भी जाती है, तो भी कार्बन उत्सर्जन में 0.3 फ़ीसद की कमी आएगी। बशर्ते कि उत्पादन कंपनियां स्वच्छ ईंधन का प्रयोग करें।

आज हम मेडिकल साइंस के लिहाज़ से भी काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं।  लिहाज़ा उम्मीद यही है कि नए कोरोना वायरस से उतनी मौत नहीं होंगी, जितनी पिछली सदियों की महामारियों में हो चुकी हैं। इसीलिए पर्यावरण में बहुत बदलाव भी संभव नहीं है।  ये बदलाव महज़ उतना ही होगा जितना की 2008-9 की मंदी के दौरान देखा गया था।  फ़ैक्ट्रियां बंद हो जाने की वजह से उस समय भी कार्बन उत्सर्जन में कमी आई थी।

Tags:
Covid-19   |  Lockdown   |  Nature   |  Air Pollutio

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