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करोना वायरस : हमने प्रकृति को लुटा , प्रकृति हमें जमींदोज कर देगी


Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 30 Apr, 2020 | 4:22 pm

क्या आप जानते हैं कि इस कोविड-19 वायरस की तरह ही पहले भी कई वायरस दुनिया में मौत का तांडव मचा चुके  है। करोना वायरस से पहले सार्स, इबोला, स्वाइन फ्लू़, जीका, एमइआरएस वायरस  लाखों लोगों को मौत की घाट उतार चुका है। और सबसे बड़ी बात ये है कि इन वायरसों की उत्त्पति औद्योगिक स्तर पर होने वाले मीट प्रोडक्शन के जरिये हुई है। ‘बिग फार्मस मेक्स बिग फ्लू’ जैसी चर्चित किताब लिखने वाले जीव विज्ञानी ‘राब वालस’ कहते हैं- ‘जो भी यह समझना चाहता है कि वायरस  लगातार इतने घातक क्यो होते जा रहे हैं, तो उन्हें खेती के औद्योगिक माडल और विशेषकर पशु उत्पादन के औद्योगिक माडल की पड़ताल करनी होगी। एक शब्द में कहें तो पूंजीवाद को समझना होगा।’ यही पूंजीवाद और उसके भीतर की गलाकाट प्रतियोगिता आधुनिक समाज को नेस्तनाबूत किये जा रहा है।

Main
Points
पेस्टीसाइट्स का 99.9 प्रतिशत सीधे वातावरण में चला जाता है
पंजाब से जयपुर के टीबी अस्पताल तक चलने वाली ट्रेन का नाम ही ‘कैंसर एक्सप्रेस’ पड़ गया है
पशुओं की प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो रही है

राब वालस ही एक अन्य जगह कहते हैं कि ये कम्पनियां अपने यहां ना सिर्फ मीट उत्पादन करती है बल्कि इसके साथ साथ ही गंभीर बीमारी पैदा करने वाले वायरस  की भी खेती करती हैं। लगभग यही स्थिति खेती में भी है। बल्कि यहां पौधों की जीन संरचना सरल होने के कारण जीन तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा जिस तरह से बड़े पैमाने पर ‘पेस्टीसाइड’ और ‘हर्बीसाइट्स’ (कीट नाशक और खरपतवार नाशक) का इस्तेमाल खेती में हो रहा है, उसने ग्बोबल वार्मिग में तो अपना योगदान दिया ही है, पृथ्वी के सम्पूर्ण वातावरण में निर्णायक बदलाव ला दिया है।

सूअर को खिलाने के लिए सोयाबीन का आटा दिया जाता है, इस सोयाबीन की खेती के लिए ब्राजील में अमेजन के जंगलों को साफ किया गया। फलतः ना सिर्फ पर्यावरण का सन्तुलन प्रभावित हुआ वरन् मनुष्य ऐसे वायरसों के सम्पर्क में भी आ गया जो पहले अछूते जंगलों में स्थानीय स्तर पर बने हुऐ थे। प्रकृति की जटिल संरचना कई खतरनाक वायरसों को उनके स्थानीय ‘घरो’ में कैद रखती है। एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, जिस तरह से अमेजन के जंगल साफ हो रहे हैं, उससे अगले 15 सालों में, अमेजन कार्बन सोखने वाला क्षेत्र ना रहकर कार्बन उत्सर्जन वाला क्षेत्र बन जायेगा। जब पूंजीवादी लालच में हम इस प्राकृतिक जटिल संरचना में हस्तक्षेप करके उन्हें एकरूप कर देते हैं तो एक तरह से इन वायरसों के लिए एक राजपथ का निर्माण कर देते हैं। इसी प्रक्रिया में पूंजीवादी औद्योगिक खेती ने दुनिया भर से करोड़ों लोगों को उनके खेतों से बेदखल किया है, उन्हें कर्ज के जाल में फंसाया  और पूरे वातावरण को जहरीला बना दिया।

यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि आज जो कंपनिया बीज व कीटनाशक क्षेत्रों में है उनमें से अधिकांश प्रथम व दूसरे विश्व युद्ध तथा वियतताम युद्ध में इस्तेमाल जहरीली गैसों के उत्पादन में लगी रही हैं। DuPont, Monsanto, Dow Chemical आदि कम्पनियां जहां अमरीका व सहयोगी देशों को जहरीली गैसों की सप्लाई करती थी, वही आज की Bayer जैसी कीटनाशक क्षेत्र की प्रमुख कम्पनी हिटलर को जहरीली गैस की आपूर्ति करती रही है। डो केमिकल और मोन्सान्टो ने वियतनाम युद्ध के दौरान कुख्यात ‘ऐजेन्ट ओरेन्ज’ गैस और ‘नापाम बम’ की सप्लाई अमरीकी सेना को की थी। शान्तिकाल में अब यही कम्पनियां उन्ही जहरीले केमिकल का इस्तेमाल इस पर्यावरण के खिलाफ कीटनाशक के रूप में कर रही हैं।

मशहूर कृषि वैज्ञानिक ‘देवेन्द्र शर्मा’ ने एक प्रतिष्ठित जर्नल में छपे रिसर्च पेपर के हवाले से कहा है कि पेस्टीसाइट्स का 99.9 प्रतिशत सीधे वातावरण में चला जाता है महज 0.1 प्रतिशत ही अपने लक्ष्य पर वार करता है। इस 99.9 प्रतिशत के कारण कितने ही दोस्त बैक्टीरिया व अन्य लाभदायक जन्तु जैसे केचुआ खत्म हो गये है। अपने देश के पंजाब प्रान्त में कैंसर के मरीजों की बढ़ती संख्या और वहां के खेतों में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशकों के बीच रिश्ता अब किसी से छिपा नहीें है। पंजाब से जयपुर के टीबी अस्पताल तक चलने वाली ट्रेन का नाम ही ‘कैंसर एक्सप्रेस’ पड़ गया है। इसी के साथ यदि ‘जिओ इंजीनियनिंग’ व ‘वार इण्डस्ट्री’ को भी शामिल कर लिया जाय तो स्थिति बहुत भयावह बन जाती है।

यह साल एंगेल्स के जन्म का 200वां साल है। मार्क्स एंगेल्स ने पूंजीवाद की इस प्रवृत्ति को अपने समय में ही समझ लिया था और पूंजीवाद के अपने अध्ध्ययन में इसे शामिल किया था। एंगेल्स ने चेतावनी देते हुए कहा है-‘हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि हम किसी विदेशी आक्रान्ता की तरह प्रकृति पर शासन नहीं करते बल्कि हम अपने हाड़-मांस व दिमाग के साथ प्रकृति का हिस्सा हैं और प्रकृृति के बीच ही हमारा अस्तित्व हैं। प्रकृति पर हमारा नियंत्रण इस तथ्य में निहित है कि हम दूसरे जीवों के मुकाबले प्राकृतिक नियमों को बेहतर तरीके से जानते हैं और उसे सही तरीके से लागू करते है।’ पूंजीवाद के पहले जो भी वर्गीय व्यवस्था थी वो महज श्रम का शोषण करती थी। पूंजीवाद वह पहली वर्गीय व्यवस्था है जो श्रम के साथ साथ प्रकृति को भी निचोड़ती है। और पूरी मानव जाति को उसका परिणाम भुगतना पड़ता है।   यही पूंजीवाद आज करोना के रूप में हमारे सामने है।

तो उद्योगों के स्तर पर पैदा होने वाले पशु नेचुरल वातावरण में जीवित नहीं रह सकते। इनके लिए एक कृतिम वातावरण बनाना पड़ता है। जैसे बिना पंख वाले मुर्गे एक खास तापमान पर ही जीवित रह सकते हैं। यानी यहां न सिर्फ कृतिम तरीके से पशुओं का निर्माण किया जाता हैं बल्कि इनके रहने के लिए कृतिम वातावरण का भी निर्माण करना पड़ता हैं।लेकिन इस प्रक्रिया में होता यह है कि इन पशुओं की प्रतिरोधक क्षमता लगभग खत्म हो जाती है। डार्विन का ‘नेचुरल सेलेक्शन’ का नियम यहां काम नहीं करता। इसका स्थान ‘पूंजीवादी सेेलेक्शन’ ले लेता है। इस परिस्थिति में कोरोना जैसे वायरस  जब इन पशुओं के सम्पर्क में आते हैं तो उनके फलने फूलने का (यानी म्यूटेट करने का) और हजारों लाखों पशुओं के एक साथ झुण्ड में होने की वजह से तेज गति से फैलने में आसानी हो जाती है।

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Corona pandemic   |  Covid-19   |  Nature   |  Revenge   |  Mankind

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