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‘प्लाज्मा थैरेपी’ से हारेगा कोरोना, ICMR ने दी ट्रायल को मंजूरी

कोरोना से ठीक हुए मरीज दूसरे रोगियों के लिए फरिश्ते साबित हो रहे हैं, उनका प्लाज्मा रोगियों को कोरोना से लड़ने की ताकत देगा

Archna Jha
Archna Jha | 14 Apr, 2020 | 1:21 pm

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज के लिए ‘कोन्सेलवेंट प्लाज्मा थैरेपी’ का सहारा लिया जाएगा। 11 अप्रैल को इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च(ICMR) ने कोविड-19 के इलाज के लिए प्लाज्मा थैरेपी के क्लिनिकल ट्रायल को मंजूरी दे दी है। आईसीएमआर के मुताबिक, वो प्लाज्मा थैरेपी का स्टैन्डर्ड प्रोटोकोल बनाने के अंतिम चरण में हैं और अब DRUG CONTROLLER OF GENERAL OF INDIA से मंजूरी लेनी होगी। इस थैरेपी का सबसे पहला परीक्षण केरल के तिरुअनंतपुरम में किया जाएगा। यहां के श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइस एंड टैक्नोलॉजी में गंभीर रुप से बीमार और वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों पर ट्रायल किया जाएगा। सकारात्मक नतीजे आए तो थैरेपी को कोरोना के सामान्य मरीजों के इलाज के लिए प्रयोग में लाया जाएगा।

Main
Points
भारत में प्लाज्मा थैरेपी के ट्रायल को मंजूरी
कोरोना को खत्म करेगा खून का प्लाज्मा
ICMR की मंजूरी के बाद केरल में परीक्षण
सार्स, मर्स, इबोला, H1N1, H3N1 से लड़ने में कारगर
अमेरिका और जापान में चल रहा है परीक्षण

क्या है ‘कोन्वलसेंट’ प्लाज्मा थैरेपी ?

गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल की डाक्टर सुशीला कटारिया का कहना है- “ जो मरीज इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं उनमें कुदरती तौर पर भविष्य में इसी प्रकार की अन्य बीमारी को बेअसर करने वाले एंटी बॉडीज बन जाते हैं। ठीक हो चुके व्यक्ति में 4 दिन बाद 200 से 500 ml प्लाज्मा बन जाते हैं जिन्हें कोन्वेलसेंट प्लाज्मा कहा जाता है। मतलब ज्यादा फायदा देने वाली रोग-प्रतिरोधी ताकत। ये प्लाज्मा खून में ही पाए जाते हैं जिन्हें फ्रेक्शन प्रक्रिया के जरिये खून से अलग कर लिया जाता है। बाद में यही प्लाज्मा किसी दूसरे गंभीर मरीज के शरीर में प्रवेश कराया जाता है। जिससे उसकी रोग से लड़ने के लिए ताकत बढ़ती है और उसका इलाज संभव हो पाता है।”

विदेशों में कारगर प्लाज्मा थैरेपी

अमेरिका में यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने कोरोना के गंभीर रोगियों पर इस ट्रायल को मंजूरी दी है। न्यूयार्क के ‘माउंट सिनाय अस्पताल’ के डाक्टर डेविड का कहना है पहले आई कुछ वैश्विक महामारियों जैसे सार्स, मर्स, स्वाइन फ्लू, इबोला, H1N1, H3N1 के दौरान भी इस थैरेपी का प्रयोग किया गया था जिसके अच्छे परिणाम मिले थे।

चीन में भी प्लाज्मा थैरेपी से मरीजों की हालत में काफी सुधार देखने को मिला था। वहां जिन लोगों ने अपना प्लाज्मा दिया उनमें से ज्यादातर डॉक्टर व नर्स थे। जो कोरोना मरीजों का इलाज करते हुए संक्रमण का शिकार हुए थे और ठीक होने के 10 दिन बाद उन्होंने अपना प्लाज्मा दान किया। जब यही प्लाज्मा कोरोना के गंभीर मरीजों में इन्जेक्ट किया गया तो उनमें केवल 12 से 24 घंटे के भीतर ही सुधार देखे गए।

जापान की सबसे बड़ी फार्मा कंपनी ‘टाकेडा’ भी कोरोना के इलाज के लिए कोन्सेलवेंट प्लाज्मा थैरेपी का ट्रायल कर रही है।

क्या प्लाज्मा थैरेपी कोरोना का अंतिम इलाज है ?

जब तक कोरोना के लिए कोई कारगर वैक्सीन नहीं मिल जाती, तब तक इस थैरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन ये थैरेपी कोरोना का अंतिम इलाज नहीं हो सकती। पहली बात, कोरोना से ठीक हुए मरीज को प्लाज्मा दान करने के लिए मनाना आसान नही होगा। दूसरी बात, खून से प्लाज्मा अलग करने की फ्रेक्शन क्रिया वाली मशीन की कमी है। तीसरी बात, प्लाज्मा दान करने के दौरान ठीक हो चुके मरीजों को दूसरी बीमारी का भी खतरा हो सकता है। जाहिर है कि इस थैरेपी का फायदा आने वाले समय में ही पता चलेगा। फिर भी कोरोना के सामने जूझ रही मानव जाति को प्लाज्मा थैरेपी के तौर पर उम्मीद की किरण जरूर नजर आ रही है।

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