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करोना वायरस के बहाने प्रेस की आजादी पर लगाम कसने की तैयारी

कोरोना वायरस महामारी के दौरान लोकतांत्रिक और तानाशाही व्यवस्था वाले देशों की सरकारों को गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकने के बहाने मीडिया पर नियंत्रण करने का मौका मिल गया है।

PB Desk
PB Desk | 05 May, 2020 | 5:08 pm

क्या दुनिया भर की सरकारें करोना  महामारी के बहाने प्रेस की आजादी पर लगाम कसने को तैयार है। जिस तरह से सूचनाओं को छुपाने की तैयारी दुनिया भर की सरकारें कर रही है ऐसे में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया अधिकार समूह ने इस बात का खुलासा किया है कि इस कोरोना वायरस महामारी के दौरान लोकतांत्रिक और तानाशाही व्यवस्था वाले देशों की सरकारों को गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकने के बहाने मीडिया पर नियंत्रण करने का मौका मिल गया है। अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थान ने ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस 2020’ विषय पर अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तानाशाही व्यवस्था वाले देशों की सरकारें ‘स्वतंत्र मीडिया पर शिकंजा कसने के लिए उसपर आपातकालीन फैसले थोप रही हैं जबकि लोकतांत्रिक देशों में जनमत को नियंत्रित करने और लोगों को कोरोना वायरस को लेकर सरकार की गलत नीतियों के बारे में जानकारी हासिल करने से रोकने के प्रयास बढ़ रहे हैं।

वियना स्थित संगठन ने कहा कि बीते ढाई महीने के दौरान उसके सामने कोरोना वायरस कवरेज से संबंधित प्रेस स्वतंत्रता के उल्लंघन के 162 मामले आए हैं, जिनमें से एक तिहाई मामलों में पत्रकारों को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है।  साथ ही उनके खिलाफ मामले दर्ज किये गए। यह रिपोर्ट इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के एक सर्वेक्षण के प्रकाशित होने के तीन दिन बाद आई है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान दुनिया भर में पत्रकारों की स्थिति खराब हो गई है।  इस दौरान पत्रकारों की नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है और मीडिया की आजादी पर हमले हुए हैं। 

भारत में भी हालात ठीक नहीं 
बता दें कि, भारत में लॉकडाउन से प्रभावित होने वाले प्रवासी मजदूरों को राहत पहुंचाने की मांग वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की कि कोरोना वायरस के संबंध में कोई भी जानकारी छापने या दिखाने से पहले मीडिया सरकार से इसकी पुष्टि कराए।  इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना महामारी को लेकर ‘स्वतंत्र चर्चा’ में कोई हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, लेकिन मीडिया को ये निर्देश दिया कि वे खबरें चलाने से पहले उस घटनाक्रम पर आधिकारिक बयान लें। सर्वोच्च न्यायालय ने आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 का उल्लेख किया था, जिसके तहत अगर कोई आपदा के समय अफवाह फैलाता है तो उसे एक साल तक की सजा या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है।  कोर्ट ने आईपीसी की धारा 188 की तरफ भी लोगों का ध्यान खींचा जिसके तहत सरकारी आदेश की अवहेलना करने पर सजा का प्रावधान है। इसके बाद पीआईबी और प्रेस काउंसिल ने मीडिया से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने की अपील की थी।

हालांकि, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि वह अदालत में सरकार द्वारा प्रवासी कामगारों के बीच घबराहट पैदा करने के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराने को लेकर ‘बहुत दुखी’ है और इस तरह की चीजों से खबरें प्रसारित करने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।  गिल्ड ने कड़े शब्दों में अपने बयान में कहा कि इस समय मीडिया पर आरोप लगाना उसके महत्वपूर्ण कार्य को प्रभावित कर सकता है जो वह इन मुश्किल हालात में कर रहा है। 
गिल्ड ने कहा था, ‘वह न्यायालय का बहुत सम्मान करता है लेकिन यह सलाह ‘अकारण और अनावश्यक’ है. दुनिया में कहीं भी कोई भी लोकतंत्र अपनी मीडिया का मुंह बंद कराकर महामारी से नहीं लड़ रहा है।

गौरतलब है कि रविवार को दुनियाभर में विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। 1993 में संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के बाद से हर साल तीन मई को विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। 

मिस्र में पत्रकार होना एक अपराध बन गया है
मिस्र में बीते चार साल से मीडिया घरानों पर कड़ी कार्रवाई की जा रही है। असंतुष्ट आवाजों को इस हद तक दबाया जा रहा है कि वहां पत्रकार होना एक अपराध बन गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की जारी एक रिपोर्ट में कुछ ऐसे ही सनसनीखेज दावे किए गए हैं। लंदन स्थित इस अधिकार समूह ने कहा कि मिस्र में कोरोना वायरस के मामले बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में सरकार सूचना पर सख्त नियंत्रण कर रही है।  इस स्वास्थ्य संकट के बीच सरकार जरा भी पारदर्शिता नहीं बरत रही। एमनेस्टी के पश्चिम एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका मामलों के निदेशक फिलिप लूथर ने कहा, ‘मिस्र के अधिकारियों ने एकदम स्पष्ट कर दिया है कि जो कोई भी आधिकारिक कथन को चुनौती देगा उसे इसका गंभीर नतीजा भुगतना होगा। ’ प्रेस स्वतंत्रता पर बढ़ती कार्रवाई के उदाहरण के तौर पर एमनेस्टी ने हिरासत में लिए गए 37 पत्रकारों के मामले सामने रखे हैं जिन पर ‘गलत खबर फैलाने’, ‘सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने’ के आरोप हैं।

दरअसल ये आरोप 2015 के उस विस्तृत आतंकवाद रोधी कानून के तहत लगाए गए हैं, जिसमें सभी प्रकार के असंतोष को शामिल करने के लिए आतंक की परिभाषा का विस्तार किया गया है।  टाइम के अनुसार, 2013 में जनरल से राष्ट्रपति बने अब्देल फत्ताह अल-सिसी के सत्ता में आने के बाद, मिस्र के अधिकांश टेलीविजन कार्यक्रमों और समाचार पत्रों ने सरकार का पक्ष लेना शुरू कर दिया और आलोचना करने से बचने लगे।  कई निजी स्वामित्व वाली मिस्र के समाचार आउटलेट देश की खुफिया सेवा से जुड़ी कंपनियों द्वारा चुपचाप अधिग्रहण कर लिए गए हैं। 
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