Your image is ready, you can save / share this image
Please wait!
#MPsPerformance


%
RANKOUT OF

दुनिया के पास विनाशकारी ताक़ते है लेकिन वेंटिलेटर नही!


Akhilesh Akhil
Akhilesh Akhil | 01 May, 2020 | 12:10 pm

क्या आपको पता है कि दुनिया में कितनी महामारियां है ? करोना  महामारी के बीच अब यह जानने की कोशिश की जा रहे है कि आखिर दुनिया में महामारियां कितनी है और उन महामारियों की पैदाइस कैसे हो जाती है। हालांकि महामरियों की पैदाइस को लेकर  यह एक जटिल सवाल है। आपको बता दें कि  2011 से 2018 के बीच डब्ल्यू एच ओ ने 172 देशों में कुल 1483 महामारियां चिन्हित की है। इन वायरसों (मुख्यतः इनफ्लुएंजा, सार्स, एमईआरएस, इबोला, जीका, प्लेग, पीला बुखार आदि) के अध्ययन के आधार पर जीपीएमबी (Global Preparedness Monitoring Board) ने आज के कोराना जैसी महामारी फैलने की सटीक चेतावनी सितम्बर 2019 में ही दे दी थी। रिपोर्ट का नाम ही था-‘A world at risk’ लेकिन इस रिपोर्ट की सुध लेने वाला कोई नहीं था। इससे पहले भी 2003-4 में सार्स महामारी आने के बाद भी वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी जारी की थी कि कोरोना परिवार का वायरस आने वाले वक्त में और खतरनाक रूप ले सकता है। यहां तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तीन साल पहले सभी देशों के जन स्वास्थ्य संगठनों को यह चेतावनी दी थी कि किसी खास वायरस के कारण एक भयानक महामारी आ सकती है और इसके लिए सभी सरकारों को अभी से तैयारी करनी होगी। इन चेतावनियों को सुनने का मतलब था कि इस पर शोध करना और भविष्य की तैयारी के लिए जन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसी ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। कारण एक ही था की कैसे लाभ कमाने के खेल को बंद किया जाए।

Main
Points
डब्ल्यू एच ओ ने 172 देशों में 1483 महामारियां चिन्हित की है
कोराना जैसी महामारी फैलने की सटीक चेतावनी सितम्बर 2019 में ही मिल गई थी
पिछले 2 माह में 1 करोड़ 80 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन किया

बता दें कि  साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था विशेषकर 2007-8 की मंदी के बाद खुद ‘आईसीयू’ में हो तो भविष्य की तैयारी कौन करे। सच तो यही है कि 90 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था वाला विश्व पूंजीवाद 270 ट्रिलियन डालर के कर्ज तले कराह रहा है। दुनिया के अधिकांश देशों में निजीकरण की आंधी में जो कुछ भी ‘पब्लिक’ था वह सब तबाह हो चुका है। सब कुछ निजी हाथों में जा चुका है। ज्यादातर देशों ने अपने यहां की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को तबाह कर दिया है। अमरीका और ब्रिटेन ने अपने यहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे तबाह किया है, यह जानने के लिए ‘माइकल मूर’ व ‘जान पिल्जर’ की डाकूमेन्टरी देखी जा सकती है। दूसरी ओर निजी कम्पनियां इस पर रिसर्च क्यों करे जिसमें कोई तात्कालिक मुनाफा नहीं है। 

इसे एक उदाहरण से साफ समझा जा सकता है। ‘जीन थेरेपी’ पर रिसर्च कर रही एक कम्पनी से उसके फंडर ‘गोल्डमान साश’ ने एक लीक हो गये ई मेल में कहा कि जीन में चेन्ज करके हमेशा के लिए रोग को खत्म कर देना ‘टिकाऊ बिजनेस माडल’ नही है। क्योकि इससे लगातार मुनाफा आने की संभावना खत्म हो जाती है। सच तो यह है कि 2020 की शुरूआत में जिस दुनिया पर कोराना ने कहर बरपाया है उसे पिछले 30 सालों की नवउदारवादी व्यवस्था रूपी दीमक ने चाट चाट कर पहले ही खोखला बना दिया है। आज यह दुनिया कैसी है, इसे आप महज दो तथ्यों से बखूबी समझ सकते हैं- हमारे पास पृथ्वी को 9 बार नष्ट करने का सामान मौजूद है, लेकिन जीवन देने वाले मामूली वेन्टिलेटर की भारी कमी है।

वेन्टिलेटर की यह भारी कमी कोरोना से मरने का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। दूसरा, दुनिया के 2153 खरबपतियों की कुल संपत्ति दुनिया के 4 अरब 60 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति के बराबर है। यही कारण है कि नवउदारवादी व्यवस्था का अलम्बरदार अमरीका इस समय सबसे बुरी स्थिति में है और इसके विपरीत सामाजिक आर्थिक व्यवस्था वाला क्यूबा सबसे अच्छी स्थिति में है। उसने ना सिर्फ अपने यहां कोरोना को नियंत्रण में कर लिया है, बल्कि दुनिया के 62 देशों में अपने डाक्टरों और दवाओं के साथ कोराना के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में हैं। जब अमरीका दूसरे देशों में सेना और टैंक भेज रहा है तो क्यूबा अपने डाक्टर और दवाएं भेज रहा है। यह दो विपरीत सामाजिक व्यवस्था का ही फर्क है कि एक मौत का निर्यात कर रहा है तो दूसरा जीवन का।

दरअसल जैसा कि मशहूर लेखिका ‘नोमी क्लेम’ ने कहा है कि शासक वर्ग जब भूकम्प, तूफान या महामारी जैसी आपदा का सामना करता है तो वह अपनी विचारधारा कहीं छोड़ के नहीं आता वरन् उसे साथ लेकर आता है। इसलिए इस तरह की आपदा में भी वह अपना वर्ग हित और भविष्य का मुनाफा देखता है। उसकी दमित इच्छाएं भी इसी समय उभरती है और वह उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयास करता है। 2019 शानदार प्रदर्शनों व आन्दोलनों का साल था। कई राजनीतिक विश्लेषक 2019 की तुलना 1848 और 1968 से करने लगे थे। इस साल पृथ्वी का कोई भी कोना विशाल जन आन्दोलनों से अछूता नहीं था। सीएए के खिलाफ भारत में जनता का शानदार प्रदर्शन इसी दौरान हो रहा था। कोरोना के बहाने शासक वर्ग ने इस सभी आन्दोलनों को तात्कालिक तौर पर खत्म करवाने में सफलता पा ली है। कोरोना के बहाने पूरी दुनिया में इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रदर्शनों की मौत, उन मौतों से कम नहीं है, जिसके समाचार से आज दुनिया भर के अखबार भरे पड़े है।

इस कोराना समय में कितने लोगों की छंटनी हुई है, इसके असली आंकड़े तो बाद में आयेंगे। लेकिन एक तथ्य से ही हम इसका अंदाजा लगा सकते हैं। अकेले अमरीका में ही पिछले 2 माह में 1 करोड़ 80 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन किया है। 1929-30 की महामंदी के बाद यह सबसे ज्यादा है।

इस कोराना समय में जिस तरह से दुनिया की सरकारों ने तानाशाही तरीके अपनाएं है, वो उनकी दमित इच्छा का ही प्रकटीकरण है। हंगरी समेत कई देशों ने तो सीधे सीधे आपातकाल की घोषणा कर दी है। अपने देश भारत में भी मोदी ने साफ साफ ‘सामाजिक आपातकाल’ बोल दिया है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में स्थिति और बुरी है। कोलंबिया की बगोटा जेल में कोरोना से निपटने के लिए बेहतर स्थितियों की मांग कर रहे कैदियों पर 21 मार्च को राज्य पुलिस ने हमला बोल दिया और 23 कैदियों को मार डाला। केन्या की सड़कों पर जितने लोग पुलिस की गोली से मारे गये, वो कोरोना से मरने वालों से कही अधिक है। सामान्य समय में यह एक बड़ी खबर बनती। लेकिन कोरोना समय में किसी ने इस पर ध्यान नही दिया। 

Tags:
Corono   |  pandemic   |   Covid-19   |   Corona vaccine   |  Ventilator   |   WHO

Stories for you

SEARCH YOUR MP

Or

Selected MP